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Name: योगेन्द्र जोशी

Registered: 28/06/08

COMMENTS: 49

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29-Mar-2013 14:53
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भैंस के आगे बीन बजे भैंस खड़ी पगुराए. कई लोग समझते हैं कि अनशन जैसे अहिंसक माध्यम से अपना पक्ष रखने से सत्तासीन लोगों को अपने निर्णय बदलने को विवश किया जा सकता है. किंतु ऐसा करना तभी वांछित परिणाम देता है जब कहीं कुछ संवेदना और शर्मोहया बची हो. इस ज़माने में ये चीज़े ग़ायब-सी हो चुकी हैं. हां, अनशनरत व्यक्ति कहीं परलोक न चल बसें यह डर ज़रूर रहता है क्योंकि उससे हिंसा फ़ैलने का ख़तरा रहता है. लेकिन तब पुलिसबल का प्रयोग मामला दबाने के काम आता है.
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24-Mar-2013 05:38
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संजय दत्त हैसियतदार आदमी हैं, उनको लेकर बहस छिड़ेगी ही. राजनैतिक रसूख और बॉलीवुड की अहम शख़्सियत होने और चाहने वालों के कारण उनके पक्ष में बोलने वालों की कमी नहीं. ताज्जुब न होगा यदि राज्यपाल महोदय माफ़ी दे दें. यह जरूर है कि उनकी माफ़ी आम जनता की धारणा को पुष्ट करेगी कि रसूखदार लोगों और आम आदमी के लिए कानून अलग-अलग होते हैं. भले ही वे माफ़ी के काबिल हों, पर जनता तो यही कहेगी कि पहुंच वाले को सजा कब होती है देश में. मतलब कि सही संदेश नहीं जाएगा.
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06-Mar-2013 17:14
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शादी न होना या बच्चे न होना ईमानदारी का आधार या उसकी पहचान नहीं होती. मायावती, जयललिता और ममता की ईमानदारी इसके उदाहरण है. भारतीय राजनीति में ईमानदारी की उम्मीद करना बेईमानी है. आज के हालात में राजनीति में वे ही आ रहे हैं जो उससे मिलने वाले सत्तासुख से वाक़िफ़ हों और जिनके बाप-दादा उनके लिए ज़मीन तैयार किए बैठे हों, या वे जिन्हे संपन्नता के बल पर राजनीति का खेल खेलने का शौक़ लगा हो, या वे जो किसी और काम के लायक़ न हों. कुछ तो ईमानदारी की उमीद लिए उसमें ज़रूर कूद रहे हैं महज़ धोखा खाने के लिए!
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23-Feb-2013 07:09
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छात्रसंघों को राजनीति से अलग रखने की बात बेमानी है, क्योंकि छात्रसंघ लोकतांत्रिक व्यवस्था में भागीदारी का एक दृष्टांत पेश करते हैं जो स्वयं में राजनीति है. हां, उन्हें राजनीतिक दलों की दखलंदाजी से दूर रखा जाना चाहिए. अर्थात्‌ प्रत्याशी खुद को किसी दल से जोड़कर पेश न करें. दलों से जुड़ने का काम वो बाद में स्थानीय, क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति में उतरने पर करें. इसका मतलब यह भी है कि कोई दल चुनाव में आर्थिक या अन्य प्रकार से उनकी सहायता भी न करे.
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27-Jan-2013 07:39
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कांग्रेस पार्टी तो नेहरू-गांधी परिवार पर केन्द्रित है और उसका अस्तित्व उसी परिवार पर निर्भर करता है. देश के अन्य दलों की भांति यह भी सत्ता की भूखी है और उसके सदस्य इस परिवार को खुश करते हुए सत्तासुख पाने में लगे हैं. ऐसे में उनके विचार क्या होंगे सोचा जा सकता है. शिंदे चाटुकारों में प्रमुख हैं. यही शिंदे अपने मंत्रीपद को "सोनियाजी की अनुकंपा" बताते थे, और यही उनके लिए जान तक देने की बात कर चुके हैं. वे कहते हैं आरएसएस के "आतंकवादी कैंप" चलाती है. तो फ़िर इन कैंपों को ध्वस्त नहीं करते वे?
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11-Jan-2013 13:11
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कुंभ मेला आस्था से जुड़ा है. यह देखने में आता है कि आस्था विज्ञान से उपर ठहरती है. इस प्रकार के आयोजन क्या-क्या समस्याएं पैदा करती है इसे विचारे बिना ही आस्थावन उसमें शरीक होते हैं. हिन्दुओं में ऐसे आयोजनों की भरमार है, लेकिन ये दुनिया के अन्य धार्मिक समुदायों में भी होते ही हैं. भारत में तो आम आदमी विज्ञान पर आधारित साधनों का उपयोग करता तो है लेकिन चमत्कारों में भी विश्वास करता है. जहां तक प्रदूषण आदि का सवाल है वह तो सभी आयोजनों से होता है. क्या पर्यटन और कार-रेसिंग प्रदूषण नहीं फ़ैलाते हैं?
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06-Jan-2013 10:50
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इस देश का इंडिया एवं भारत में बंटा होना निस्संदेह एक वास्तविकता है, जिसे प्रायः सभी स्वीकारने लगे हैं. लेकिन इस विभाजन का आपराधिक घटनाओं से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि इसका आधार वस्तुतः समाज में आर्थिक विसंगति तथा परंपराओं की अवहेलना हैं. इंडिया में सभी प्रकार के अवसर एवं सुविधाएं हैं और विकसित समाजों जैसा दिखने की ललक है जब कि भारत इस मामले मं अभी काफ़ी दूर है. लेकिन अपराध दोनों में होते है. गांवों को इंडिया कहते हुए यह कहना कि वहां बलात्कार एवं अन्य अपराध नहीं होते नितांत असत्य/दुराग्रह है.
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19-Dec-2012 06:26
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फांसी की सज़ा के प्रावधान से बलात्कार जैसी घटनाएं रुकेंगी यह मानना मूर्खता होगी. अपराध की घटनाएं समाज में बढ़ रही संस्कारहीनता का परिणाम है. क़ानून से लोग संस्कारित नहीं होते हैं कुछ लोग परिस्थितियों के अनुकूल होने पर अपराध करने से नहीं चूकते. हालात तब अनुकूल होते हैं जब पहला, क़ानून होते हुए भी उसका कारगर कार्यान्वयन नहीं होता है; दूसरा उन्हें रोकने वाला कोई नहीं होता; तीसरा, जब पुलिस की निष्क्रियता के प्रति वह आश्वस्त होता है; और चौथा, यह विश्वास करता है कि क़ानूनी प्रक्रिया वर्षों चलती रहेगी.
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06-Dec-2012 11:07
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भारत की किस समस्या के लिए राजनेता जिम्मेदार नहीं हैं? चारों तरफ़ व्याप्त भ्रष्टाचार किसकी देन है और कौन उसका संरक्षण कर रहा है? राजनीति में अपराधियों को कौन पालपोस रहा है? लोकतंत्र की हिमायत का दिखावा करने वाली पार्टियों में मौजूद परिवारवाद दिखाता नहीं कि उनमें खुद लोकतंत्र नहीं है? पुलिस की संवेदन शून्यता और प्रशासन के निकम्मेपन का ज़िम्मेदार सत्तासीन राजनेता नहीं हैं क्या? क्या-क्या गिनाएं? ओलंपिक तो बहुत छोटी चीज़ है!!
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22-Nov-2012 11:43
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सवल का सीधा-सपाट उत्तर संभव नहीं. हर दंड के अनेकों पहलू होते हैं. किसी अपराधी को दंडित करके आप वस्तुतः उन लोगों को भी दंडित करते हैं जो उससे संबंध रखते हैं और जो उसके अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं होते, जैसे नादान बच्चे या वृद्ध मां-बाप. यह कहना भी सही नहीं कि मृत्त्युदंड का भय अपराधों को रोकता है. ऐसे भी अपराधी होते हैं जो जान पर खेलने को तैयार रहते हैं. मानव बम कौन बनते हैं? जहां कानूनी व्यवस्था कमजोर होती है वहां तो भय होता ही नहीं जैसे भारत में
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12-Nov-2012 07:02
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भारतीय समाज ब्रिटिश समाज से एकदम भिन्न है. अगर अंतर न होता तो उनका इस देश पर शासन कैसे होता! संख्या में कम होते हुए भी उन्होंने कई क्षेत्रों पर आधिपत्य जमाया था. भारत ने तो ऐसा नहीं किया? उल्टे राज स्थापित करने में मदद ही की. वहां के लोगों की सोच सर्वथा भिन्न रही है. इस देश में तो राजनेता गाली-गलौज की भाषा बोलने में गर्व अनुभव करते हैं और उनके शीर्षस्थ नेता उनका पक्ष लेते हैं. वस्तुतः ऐसी सोच ही इस समाज की रही है. समाचार माध्यम से जुड़े लोग कहीं बाहर तो टपके नहीं हैं. उनसे भी क्य़ों उम्मीद करें?
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04-Nov-2012 05:42
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कांग्रेस की मान्यता रद्द होनी चाहिए या नहीं मामले के कानूनी पक्ष पर निर्भर करता है जिसे कानूनविद ही बता सकते हैं. आम आदमी कानून की गहन समझ नहीं रखता. रही बात आरोपों की तो राजनेताओं का एक ही जवाब रहता है: आजकल तो हरकोई झूठा आरोप लगा देता है, किसी की क्यों परवाह करें? हर आरोप झूठा होता हो यह मानना मुश्किल है. कहीं आग होगी तभी धुंआ उठेगा. निपट लगत आरोप लगाने वाले के विरुद्ध कदम क्य़ों नहीं उठते? मानहानि की बंदरघुड़की देते हैं पर करते कुछ नहीं. कांग्रेस दल कानूनन गलत है तो कुछ दंड अवश्य मिलना चाहिए.
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30-Oct-2012 17:03
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किसी देश को महाशक्ति कहने का यह अर्थ कदापि नहीं कि उसने प्रकृति को मात दे दी है. अमरीका केवल इस अर्थ में महाशक्ति है कि उसने प्रकृति के नियमों और उसके संसाधनों के दोहन की कला विकसित की है और उसी के बल पर सामरिक एवं आर्थिक दृष्टि से अन्य देशों पर हावी हो सका है. परंतु वह प्राकृतिक आपदाओं को भी टाल सकता है यह उम्मीद करना मूर्खतापूर्ण है. हां आपदाओं का सामना वह बेहतर कर सकता है इसमें दो राय नहीं. किंतु उनका घटित होना रोक नहीं सकता है - कोई नहीं रोक सकता.
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26-Oct-2012 07:08
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भारतीय समाज विचित्र है. इतिहास साक्षी है कि इस देश में सदा ही सामाजिक और आर्थिक असमानता रही है जिसका औचित्य संपन्न एवं प्रतिष्ठित वर्ग भांति-भांति के (कु)तर्कों के बखूबी सिद्ध करता आया है. समाज में सदा से ही एक वर्ग ऐसा रहा है जो अपनी संपन्नता और दूसरों की विपन्नता देख खुश होता है. यदि उसे दूसरे का हक भी मिल रहा हो तो उसे बिना ग्लानि के स्वीकार लेगा. यह सोच हमारे जनप्रतिनिधियों, प्रशासकों मे स्पष्ट दिखती है. फ़ॉर्मुला-1 रेस इसी मानसिकता का परिणाम है. इंडिया-भारत के अंतर से उन्हें कष्ट नहीं है.
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20-Oct-2012 07:00
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लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था जब अयोग्य लोगों के हाथ में पहुंचती है तो वह देश/समाज के लिए घातक हो जाती है. देश का दुर्भाग्य है कि यहां यही हो रहा है. हमारे राजनेताओं को देशहित की चिंता नहीं बल्कि सत्ता हथियाने और उस पर कब्जा जमाने का नशा चढ़ा हुआ है. इसके लिए वे हर हथकंडे को जायज़ मानते हैं. आम जनता के लिए लोकलुभावन कदम उठाना और सरकारी मुलाजिमों को खुश रखना इसी मकसद के लिए है. व्यापक एवं दीर्घकालिक सामाजिक हित जाएं भाड़ में. ममता बनर्जी बस यही करके सत्ता पर काबिज रहना चाहती हैं. गलत-सही कौन पूछे?
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