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Name: अमित भारतीय

Registered: 29/06/08

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13-Apr-2013 05:58
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सोशल मीडिया की मानी जाए तो अन्ना देश के राष्ट्रपति होते, केजरीवाल/मोदी प्रधानमंत्री, सोनिया के साथ दिग्विजय को निर्वासित कर दिया जाता, कलमाड़ी/राजा को कालापानी की सज़ा मिल जाती, लोकपाल कब का आ चुका होता, भ्रष्ट जेल में होते, रिटेल में विदेशी निवेश को मंजूरी न मिलती.
महज 11% इंटरनेट उपयोगकार्ता, सोशल मीडिया पर क्रांति चाहने वालों को वोट डालने में गर्मी/सर्दी लगती है. उनकी नज़र में एक वोट से थोड़ी न देश बदलता है.2009
लोस चुनाव में 50% से अधिक ने मतदान नहीँ किया जिसमें अधिकतम उच्च और मध्य वर्ग का फेसबुकी समाज था
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06-Apr-2013 10:05
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ये देश का दुर्भाग्य है कि तथाकथित गांधी के शिष्य, देश के भावी नेता फिक्की एसोचैम और सीआईआई के मंचों पर पैदा हो रहें हैं. मोदी चमक-दमक से मध्यमवर्ग को लुभाना चाहते हैं, तो राहुल को वो समाजवाद याद आरहा है जो 91 में ही खूंटी पर टांग दिया गया. दुनिया में एक भी ऐसा देश नहीं है जहां कॉरपोरेट्स से राहुल/मनमोहन/मोदी वाला समाजवाद आया हो लेकिन फिर भी उद्योगपतियोँ पर भरोसा और उनकी माया तो देखिए कि मोदी और राहुल एक दूसरे को कोसते हुए 'गुलाबी' समाजवाद लाने को बेताब हैं.
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29-Mar-2013 13:32
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सत्ता की राजनीति में कोई विदेश नीति, अर्थनीति या पर्यावरण जैसे भारी भरकम मुद्दे उठाए तो आम जन को ये समझ में नहीं आते, कोई भ्रष्टाचार, कालेधन या महगांई का मुद्दा उठाए तब भी जनता नहीं आती, अब केजरीवाल बिजली-पानी जैसे मूलभूत मुद्दे उठाए तब भी जनता न आए तो फिर कौन से मुद्दे जनता को 'सीधे' प्रभावित करते है? लोगों को केजरीवाल 'अतिमहत्वाकांक्षी/उदार तानाशाह' लगते हैं, तो जनता किसे चाहती है? एनडीए का शासन इतना ख़राब था जो यूपीए-3 और तीसरे मोर्चे की चर्चा हो रही है.
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15-Mar-2013 05:31
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अंगुलिमाल बहुत कम ही मिलते हैं. लोग अपने किए पर कितना पछताते ही हैं-ऐसा मानकर किसी को सुधरने का मौका नहीं दिया जा सकता. बलात्कारी व्यक्ति अगर खुद भी सुधर जाए तो उससे समाज को क्या फायदा होगा? जो लोग ऐसे अपराध करते हैं उनपर इसका क्या सकारात्मक फर्क पड़ेगा? क्या पीड़िता की मान-मर्यादा लौट सकती है? कुछ विकसित देशों के उदहारणो के आधार पर सज़ा की कठोरता को अपराध के लिए जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता. सज़ा के साथ-साथ भी सुधरने का विकल्प तो रहता ही है.
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06-Mar-2013 17:08
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हमारे यहां गृहस्थ जीवन को अन्य आश्रमों के बराबर ही महत्व है. परिवार किसी व्यक्ति की उन्नत्ति में बाधक बन भी सकता है और नहीं भी. लेकिन क्रांतिकारी कार्योँ में एक समय ज़रुर ऐसा आता है जब व्यक्ति को क़दम उठाने से पहले परिवार की तरफ़ देखना पड़ता है. परिवार से व्यक्ति के कार्य बंट जाते हैं, परिस्थितियों से समझौता करना पड़ सकता है. गांधी जी भी सर्वश्रेष्ठ देने के लिए ब्रह्मचर्य को श्रेष्ठ मानते थे. संघ और भाजपा में तो ऐसा त्याग देखने को मिलता है, लेकिन राहुल की यह बात व्यवहारिकता की कसौटी पर सच नहीं लगती.
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06-Mar-2013 17:06
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अगर राहुल गांधी वंश न बढ़ाकर राजनीति करना चाहते हैँ तो अच्छा है लेकिन 125 साल से ज़्यादा की कॉग्रेस की कमान कौन संभालेगा? फिर तो कॉग्रेस पार्टी के अस्तित्व के लिए इसकी डोर प्रियंका रार्बट वाड्रा को ही थमानी होगी, क्योंकि सभी जानते हैं कि यह पार्टी एक परिवार के कारण ही संगठित रह पाती है.
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28-Feb-2013 13:48
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"आपका बजट, आपके हाथ" से भाषण की शुरुआत से वित्तमंत्री के इरादे स्पष्ट हैं. मनरेगा के अलावा अन्य फ्लैगशिप कार्यक्रमों में धन का आवंटन बढ़ा है. कर में मामूली छूट और महिलाओं संबंधी प्रावधान से मध्यम वर्ग को खुश करने की कोशिश है. साथ में कॉरपोरेट को भी निराश न कर सबको साथ लेने की कोशिश की गई है. बढ़ते राजकोषीय घाटे के बावजूद सामाजिक कार्यों पर खर्च बढ़ाना और कर की दरों में भी कोई बदलाव न करना समझ से परे हैं अंत में कमर तोड़ती महंगाई से निज़ात न मिलना चुनावी लक्ष्य में बाधा बन सकता है.
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27-Feb-2013 02:25
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मुझे तो अर्थव्यवस्था का पूंजीवादी मॉडल ही समझ में नहीं आता. साम्यवाद का भी समर्थक नहीं हूं जहाँ विकास अधिक से अधिक उपभोक्तावाद(अपव्यय)पर टिका है. व्यवस्था को बनाए रखने के लिए उद्योगों को छूट दी जाए ताकि वे अनावश्यक चीजों का उत्पादन कर जल, थल और वायु को विषाक्त न करें. लोग भी चकाचौंध को ही सभ्यता का पैमाना मानकर अपने को उसमें फिट करने को उतावले न रहें. इसमें किसका भला होता है? कुछे एक मुठ्ठीभर लोगों का. अगर ऐसे ही चलता रहा तो पृथ्वी पर प्रणियों में सिर्फ मानव ही बचेगा.
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22-Feb-2013 01:16
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जेएनयू जैसे एक-आध विविः को छोड़कर किसी भी कॉलेज/यूनिवर्सिटी मेँ छात्र संघ चुनाव विचारधारा के स्तर पर नही होते. ऐसी जगहों पर छात्र राजनीति अपना बाहुबल/गुण्डई दिखाने से ज्यादा कुछ नहीं. यहाँ पर भी जातीय, क्षेत्रीय समीकरणो और पैसे का बोलवाला है. पार्टियों का नाम वोट पाने का बहाना भर है. जहाँ राजनीति का क, ख, ग सीखना चाहिए वहाँ ये हाल है तो ऐसे में कोई पार्टी हो या न हो बहुत फर्क नहीँ पड़ने वाला. लेकिन फिर भी दलविहीन करके छात्र राजनीति कैसी होगी? छात्रों के पास अपने पक्ष में वोट मांगने के क्या तर्क होंगे?
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15-Feb-2013 14:06
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चार वर्षों की सरकार की अक्षमताओं और घपले-घोटालों से जनता का ध्यान बंटाने के लिए इन निर्णयों से अच्छा कुछ नहीं हो सकता था. अजमल-अफज़ल को फांसी से विपक्ष पस्त है तो बलात्कार के मामले में फांसी के अध्यादेश से मध्यवर्ग संतुष्ट. फिर दया याचिकाओं की लम्बी होती फेहरिस्त भी राष्ट्रपति जी के लिए चिंता की बात हो सकती है, क्योंकि जब तक म्रत्युदण्ड की सजा कानून में रहेगी तब तक दया याचिकाओं को हाँ या न, कहना ही पड़ेगा. रही बात संयुक्त राष्ट्र के मृत्युदंड विरोधी प्रस्ताव की तो जनता का स्तर अभी वहां तक नहीं पहुंचा है.
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06-Feb-2013 08:41
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बीबीसी के ही अनुसार जिन मुफ़्ती साहब ने ये फ़तवा दिया उनकी बातों को बहुत ज्यादा तबज्जो नहीं दी जाती, ऐसे में इस मुद्दे पर उन्होंने क्या कहा, क्या नहीं, इसे महत्व न दिया जाए तो ही ठीक रहेगा। अगर किसी धर्म में संगीत को लेकर आपत्तियां है तो उस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती.रही बात संगीत की तो ये तो ये न सिर्फ कश्मीर से बल्कि पूरी भारतीय संस्कृति में गहरे तक जुड़ा है.मैं भी थकान में हल्का संगीत सुनता हूँ.बैंड की लड़कियों को अगर किसी भी प्रकार की असुरक्षा की भावना हो तो इसका तुरंत समाधान हो.
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01-Feb-2013 18:44
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संविधान के अनुच्छेद 19(1) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ 19(2) में इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन का प्रावधान है. ऐसे ही मानवाधिकारों की सार्वभौमिक धोषणा के अनुच्छेद 29 में भी इस स्वतंत्रता को सीमित करने की छूट दी गई है.
आशीष नंदी के बयान का अधिकतर विद्वानों ने समर्थन किया है लेकिन उनके कथन को एक बार सुनने में तो नंदी से सहमत होना असहज करता है. लेकिन व्यापक रुप से उनकी सोच सही है. यहाँ मैं समाज में बढ़ती असहिष्णुता से सहमत हूँ. लोग अपने स्वाद से इतर कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं जिसमें राजनीति एक और 'छौंक' लगा देती है.
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01-Feb-2013 18:41
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अब इसके लिए सिर्फ जनता को दोष देना ठीक नहीं लगता. जब जनता बुद्धजीवियों का विरोध करे तब उस पर असहिष्णु होने का तमगा दे दिया जाता है लेकिन जब यही बुद्धजीवी जनता की बातों को अनसुना करउसे भीड़तंत्र की अप्रत्यक्ष संज्ञा दें तब आखिर वो जनता क्या करे? तथाकथित बुद्धजीवियों और जनता दोनों को चीजों को व्यापक रुप से लेने की जरुरत है, साथ ही ऐसी बातों से एकदम बचा जाना चाहिए जिनके विरोधाभाषी अर्थ हों. वरना अर्थ का अनर्थ होना निश्चित है.
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25-Jan-2013 17:20
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चिदम्बरम, दिग्विजय और शिँदे जी सही कहते है, भारत मेँ आतंकवाद के कारण नितांत घरेलू है! 'आंतकी हिन्दुओँ' को तो वे-बजह सीधे-साधे पाकिस्तान पर आरोप मढ़ने की आदत पड़ गई है, देश का विभाजन के लिए भी यही दोषी थे. SIMI, IM और MIM को तो देश निर्माण की जिम्मेदारी सौपनी चाहिए.!!
जब आंतक को 'हरे' या 'लाल' का रंग नहीँ दिया गया तो भगवा क्योँ?
जो भी दोषी हो उसे दण्डित किया जाए. केसरिया त्याग, तपस्या और देश पर मर मिटने का प्रतीक है, निर्दोषोँ को मारने का नहीं. "भारत पंथनिरपेक्ष है क्योँकि यहाँ हिन्दू बहुसंख्यक है"
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19-Jan-2013 01:11
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पाकिस्तान ने 1,000 साल तक लड़ने का वादा किया है अपनी जनता से, अभी तो उसे 960 साल और लड़ना है. संबंध सुधरने चाहिए लेकिन इसके लिए एकतरफा प्रयास काफी नहीं है. भारत शांति का पुजारी है. इसे हमारी कमजोरी ना समझा जाए. पाक की करतूतों को हर क्षेत्र में माकूल जवाब दिया जाना चाहिए. इतना होने के बाद 'अमन की आशा' की जाए? 'बिजनेस कॉन्ट बी एज यूजुअल', हम कोई युद्ध लड़ने नहीं जा रहे है. भारत सरकार के कदम सही है.
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