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vivek ranjan shrivastava
29/06/08
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22-Apr-2013 15:46
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ऐसा करके सरकार ने अपना नैतिक दायित्व पूरा कर दिया है. अब यह मुकेश अंबानी का दायित्व है कि वे जनता के पैसों का इस तरह उपयोग न करें. वे स्वयं आगे आकर 22 लोगों के सुरक्षा दल का खर्च उठाएं .
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22-Mar-2013 15:31
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जो लोग उन्हें माफ़ करने की बात करते हैं, वे यह समझने का कष्ट करें कि कम से कम न्याय के मंच पर सभ को बराबर ही रहने दें.
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15-Mar-2013 16:03
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उत्तर बहुत सरल है , केवल यह अध्ययन किया जाए कि पिछले 20 वर्षों में कितने प्रतिशत अपराधी सुधरे हैं? मेरे पास आंकड़े तो नही है किन्तु मनोविज्ञान के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि बलात्कारियों सहित अपराधियो को सुधरने का मौक़ा दिया जाना बहुत लाभकारी नही हो सकता, अधिकांश अपराधी तो जेल से भी अपराध संचालित करते दिखते ही हैं. बलात्कारी भी नारी मात्र को बेहद घटिया मानसिकता से ही देखते हैं.
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10-Mar-2013 03:37
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परिवार का पहले आना अस्वाभाविक नहीं है और गलत भी नहीं है लेकिन राजनेता को देश की जनता को ही अपना परिवार मानना चाहिए.
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28-Feb-2013 13:55
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27-Feb-2013 04:05
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आम जनता को मंहगाई से थोड़ी सी राहत, कर्मचारियों को आयकर में थोड़ी सी बचत, युवाओं को शिक्षा और रोजगार की थोड़ी सी सुविधाएं, कृषकों का कुछ भला और क्या दे भी सकते हैं वित्त मंत्री. वैसे मैं बजट बनाता तो बचत की सीमा एक लाख से बढ़ाकर तीन लाख करता, बीसियों साल से नेशनल टेलेंट सर्च के तहत छात्रों को दी जा रही सात सौ रुपए की छात्रवृत्ति या अन्य स्कॉलरशिप आदि सुविधाओं व सब्सिडी को मंहगाई भत्ते से जोड़ देता.
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21-Feb-2013 15:04
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छात्र संघो की राजनीति में देश की राजनैतिक पार्टियो का दखल ही अपराध को जन्म देता है. छात्र राजनीति का जो मूल उद्देश्य है कि विद्यार्थी स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्परा को समझ सकें वह गौण हो जाता है तथा देश की युवा शक्ति को दिग्भ्रमित कर राजनैतिक दल अपना उल्लू सीधा करते दिखते हैं. बेहतर हो कि शिक्षा परिसरो से पेशेवर राजनीति को दूर ही रखा जाना जरूरी है.
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15-Feb-2013 13:49
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हर फांसी की सजा अंतिम रूप से दया याचिका के रूप में राष्ट्रपति तक पहुंच ही जाती है, जहां बहुत लंबे समय तक अनिर्णित ही पड़ी रहती है. यह विलंब भी तो न्याय की उपेक्षा ही है. अतः यदि राष्ट्रपति इन लंबित मामलों में फैसले लेते हैं तो ठीक ही है. कसाब और अब अफ़ज़ल गुरू को दी गई फांसी आतंक को जबाब है. दुर्लभतम अपराध में अधिकतम सज़ा फाँसी जनमत का आदर भी है और अपराधियों के लिये खौफ भी.
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07-Feb-2013 11:32
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जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी और कट्टरपंथी हावी होते जा रहे हैं . मुफ़्ती बशीरउद्दीन अहमद का बयान भी उनकी , आतंकियो को खुश करने की कोशिश का हिस्सा है . कश्मीर सहित दुनिया में कहीं भी संगीत गैर धार्मिक हो ही नही सकता , इस अव्यवहारिक दबाव का समाज को पूरी ताकत से जबाब देना चाहिये .
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26-Jan-2013 14:46
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शिंदे के इस बयान में ज़रा भी सत्यता नहीं है ये बयान नासमझी में व अति उत्साह में की गई राजनीति है. प्रश्न है कि क्या कांग्रेस को हिन्दू वोट नही चाहिए? अतः हम यही मानकर चलते हैं कि विवादास्पद बयानो से चर्चा में बने रहने के इस समय में शिंदे की ज़ुबान फिसल गई थी.
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19-Jan-2013 03:56
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पाकिस्तान या अन्य देशो की ऐसी हरकतो पर हमेशा से भारत बहुत ही उदारवादी लचर नीतियाँ अपनाता रहा था अतः जब इस बार जन-भावनाओ के अनुरूप इस तरह के कड़े फैसले हुए तो दुनिया चौंकी. किन्तु देश के व्यापक दीर्घगामी हित में ये बिल्कुल सही फैसले हैं. अमेरिका भी तो स्वयं के हितो के लिये इससे भी कड़े कदम लेता है.
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11-Jan-2013 17:39
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कुंभ का आशय केवल पाप और पुण्य ही नही है, यह सामूहिक चिंतन, मिलन और वैचारिक विनिमय का समागम भी है. धार्मिक, राजनैतिक, व्यापारिक व सामाजिक मेला भी है ......अतः कुंभ सदा प्रासंगिक बना रहेगा. नदी में डुबकी लगाओ या नही ...मन चंगा तो कठौती में गंगा ही है.
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05-Jan-2013 04:45
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यह खेदजनक है कि हमारे राजनेता ऐसे संवेदनशील मुद्दो को भी अपनी राजनीति से विवादास्पद बना देते हैं . गांवो में और घरो में कही ज्यादा बलात्कार होते हैं पर अशिक्षा व हौसले के बिना वे दब जाते हैं अतः मोहन जी की यह इंडिया और भारत की तुलना निरर्थक है . कैलाश विजयवर्गिय स्वयं घपलो में लिप्त विवादास्पद मर्यादाहीन व्यक्ति हैं उन्हें मर्यादा का पाठ पढ़ाने का नेतिक अधिकार ही कहाँ है ?
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31-Dec-2012 05:51
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न केवल बलात्कार वरन् अनेक ज्वलंत मुद्दों जैसे चुने गए नेताओं को वापस बुलाना या अन्य विषयो पर कानूनी परिवर्तन समय के साथ जरूरी हो चला है, समाज के दबाव से ही सही राजनेताओ को सही फेसले लेने की जरूरत है.
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19-Dec-2012 02:27
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यह सामाजिक विकृति समस्या बन चुकी है, समाज दोहरे चरित्र के साथ जी रहा है. हर घर में मां बहनें लड़कियां होती हैं, पर जो मानसिकता पुरुष उनके प्रति रखता है उसके ठीक विपरीत वह अन्य स्त्रियो के प्रति रख रहा है. दुखद है ! कड़ी सज़ा, तात्कालिक संदेश दे सकती है पर स्थाई निदान नैतिकता की शिक्षा और जो मानसिक भोजन समाज को फ़िल्मों व इंटरनेट के ज़रिए मिल रहा है उसे बदलने में ही है.
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