इस बहस को सहेज कर रख लिया गया है – जवाब देने की अनुमति नहीं है

गोत्र, जाति, संप्रदाय की सीमा लांघकर...

भारत में आए दिन कोई ऐसा मामला सुनने को मिलता है जिसमें किसी नव-विवाहित युगल का शोषण किया जा रहा हो, उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा हो और इसकी वजह खोजने पर पता चलता है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दोनों ने शादी के लिए कुल, गौत्र, जाति या संप्रदाय की समाज में प्रचलित मान्यताओं और सीमाओं का उल्लंघन किया है.

कभी इन युगलों को आर्थिक-मानसिक-शारीरिक यातनाओं से गुज़रना पड़ता है. कभी सामाजिक रूप से इन्हें बहिष्कृत किया जाता है. कभी-कभी प्यार करने या ऐसी सीमाओं को लांघकर शादी करने की क़ीमत इनकी ज़िंदगी होती है.

तो बीबीसी इंडिया बोल में इसबार चर्चा इसी बात की. क्या शादी के लिए गोत्र, जाति और संप्रदाय को आधार मानना सही है. अगर आप इन पारंपरिक तरीकों को सही मानते हैं तो क्यों, और अगर नहीं तो क्यों नहीं.

अगर कोई युगल गोत्र, जाति और संप्रदाय की सीमाओं को लांघकर शादी कर भी ले तो क्या ऐसा करने के लिए उनको किसी भी तरह की सज़ा देना या उन्हें परेशान करना सही ठहराया जा सकता है. क्या सामाजिक रूढ़िवादी मान्यताएं क़ानून और वैज्ञानिकता के दायरे से बढ़कर हैं. क्या सोचते हैं आप इन तमाम सवालों के बारे में.

ऑनलाइन पर यह बहस अब आपके बीच है. अगली कड़ी में यानी 10 नवंबर, मंगलवार, भारतीय समयानुसार रात आठ बजे हम आपके बीच फिर होंगे रेडियो की इस विशेष प्रस्तुति के साथ.

रेडियो कार्यक्रम में शामिल होने के लिए टोल फ्री नंबर 1800-11-7000 पर फोन करके कार्यक्रम में लाइव शामिल हों.

भारत के बाहर से जो लोग शामिल होना चाहते हैं, वे हमें hindi.letters@bbc.co.uk पर संपर्क करें. आप टोल फ्री पर पहले से भी अपना संदेश रिकॉर्ड करा सकते हैं. इन्हें कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा. ऑनलाइन की प्रतिक्रियाएं भी होंगी रेडियो कार्यक्रम का हिस्सा.

तो इंतज़ार किस बात का. बोल, बीबीसी इंडिया बोल.

प्रकाशित: 11/8/09 6:09 AM GMT

टिप्पणियाँ

टिप्पणियों की संख्या:49

सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं

Added: 11/11/09 10:50 PM GMT

मेरा मानना है कि जाति और गोत्र को नज़रअंदाज़ कर होने वाली शादी टिकाउ नहीं होती. अगर वो लंबी खींच भी जाती है तो कई समस्याएं पैदा कर जाती हैं. मैंने अपने जीवन में ऐसे कई उदाहरण देखे हैं.

Puneet Sharma Toronto

Added: 11/11/09 6:00 PM GMT

मैं देश से बाहर रहता हूँ और इससे बात से सहमत नहीं हूँ कि जाति की बाधी को तोड़तकर शादी करना चाहिए. मैं एक बात बता चलूँ कि बात करना आसान है लेकिन व्यवहारिक क़दम उठाना दूसरी बात.

dhanaram riyadh

Added: 11/11/09 9:00 AM GMT

सच बात यह है कि समाज में किसी की कोई आध्यात्मिक ट्रेनिंग नहीं है. और यही कारण है हम बीमार हैं और समझ पा रहे हैं कि क्या सही है और क्या ग़लत है. हमारी किताबों में साफ़ लिखा है क्या कैसे करना है. बस उसका पालन करने की आवश्यकता है.

Rajesh Yadav Patna

Added: 11/11/09 6:32 AM GMT

मेरा कहना है कि समय के साथ शादियों के रिवाज भी बदलते रहते हैं. और हम क्यों भूल जाते हैं उस कहावत में जिसमें कहा गया है. मियाँ बीवी राज़ी तो क्या करे क़ाज़ी. जहाँ आज़ादी और लोकतंत्र की मर्यादा है.

munnababu vishakhapatnam

Added: 11/11/09 6:10 AM GMT

जहां तक जाति गोञ का सवाल है भारतीय परिवेश में यह संभव नहीं है क्‍योंकि नवविवाहिता दूसरे समाज में अपने आपके स्‍थापित नहीं कर पाती है अन्‍य समाज या अपने गोञ की सामाजिक उतपीडन का शिकार बतनी रहेगी. जहां तक नव युगल अगर गांव में न रहकर शहर में रहता है तथा इन सब से दूर है तब यह संभव हो सकता है कि वह आजाद रहे लेकिन गांव में रहकर उसे सामाजिक मर्यादाओं का पालन करना होगा 1 यदि ऐसा नहीं होता है तो शादी ज्‍यादा दिन तक चलने वाली नहीं होती है व्‍यक्ति सामाज व गौञ के पिछे जाना जाता है न कि अन्‍य माध्‍यम से

HARI BISHNOI DHORIMANNA(BARMER),RAJ

Added: 11/11/09 5:30 AM GMT

यदि अन्तर्जातीय विवाह बहुलता से होने लग जाते हैं तो जो दुनिया की सबसे बेहतरीन सुसंघठित और सुनियोजित गुलामी की व्यवस्था है उसका क्या होगा? सब कुछ छिन्न-भिन्न हो जाएगा ! फिर कौन किसका गुलाम रहेगा !! इसीलिए तो इस हिन्दु समाज में जब कोई गुलाम धर्म परिवर्तन करके इस्लाम को अपना लेता है अथवा क्र्य्चिनिटी में या बुद्धिज्म में अपना विश्वास दृढ करता है तो गुलामी के बादशाह इन हिन्दु धर्म के ठेकेदारों को आग लग जाती है

देवव्रत चौहान New Delhi

Added: 11/10/09 2:55 PM GMT

कभी सही नहीं सो सकता की लोग अपनी इच्छा के लिए ब्यक्तिगत स्वतंत्रता की उलंघन करे. आप को याद होगा एक समाचार- प्रेम प्रसंग में आठ लोगों की हत्या . 8 फरवरी को प्रकाशित हुआ था . क्या ये सही है. कोई भी सभ्य व्य्क्ति इसे सही नहीं ठहरा सकता है.

Shiva Adhikari जर्मनी

Added: 11/10/09 2:49 PM GMT

जो भी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का हनन करते हैं वे पशुओं से भी बदतर हैं और यह होता भी वंही है जँहा पीड़ित पक्ष कमजोर होता है नही तो इस देश में अन्तर्जातीय, अन्तर्धर्मी शादियाँ भी होती है और बहुत अच्छी तरह निभ भी रही हैं शाहरुख़ का उदाहरण देख लो तथा कई धर्मों में समानगोत्रीय शादियाँ वैध हैं उनमें कोई जेनेटिक प्रोब्लम अब तक तो हुई नही है गलती इस देश की सरकार की है जो इन मामलों को गंभीरता से नही लेती जबकि यह बहुत बड़ा मसला है और जातिवाद ऐसे ही रहा तो यह देश के विघटन में कारण भी बन सकता है

देवव्रत चौहान New Delhi

Added: 11/10/09 2:35 PM GMT

इस देश के लोगों ने आत्म निरिक्षण करना छोड़ दिया है नहीं तो इंसान के लिए 'इंसान' यह एक लेबल ही पर्याप्त था इस देश में सूरज और चाँद के वंशज रहते हैं और कुछेक सात तारों के भी उत्तरपाषाणयुगीन इन कपोल कल्पनाओं को आज विज्ञान के इस युग में प्राईमरी का छात्र भी जब सुनता है तो कई बार हंसता है लोग अन्तर्जातीय विवाहों को अपने इगो से जोड़ लेते हैंऔर व्यतिगत स्वतन्त्रता का हनन करते हैं इस आजाद देश में एक तिहाई लोग तो गुलाम हैं ही शहरी कुछ महिलाओं को छोड़कर ग्रामीण 70% आबादी की स्त्रियाँ भी गुलाम ही हैं चिन्तन

देवव्रत चौहान New Delhi

Added: 11/10/09 2:21 PM GMT

जातिवादियों के पूर्वाग्रह इतने मजबूत हैं कि उनके सामने सब तर्क व्यर्थ हैं वैसे तर्क हमारे चिंतन और सूझ की कुछ बंद खिड़कियों को खोल देता है और हमें किसी नए निष्कर्ष तक ले जाता है लेकिन हम इससे अधिकतर ठीक उल्टा काम लेते हैं हम अपने पूर्वाग्रहों को और अधिक दृढ करने के लिए और अधिक तर्क खोजते हैं जातिवाद को तर्क संगत ठहराने का प्रयास करते हैं वैसे अन्दर-अन्दर सभी जातिवाले यह मानते हैं कि जातिवाद गलत है किन्तु अपने अपने स्वार्थों के कारण इसको बनाए रखना चाहते हैं अंतरजातीय विवाह इसलिए इनको मंजूर नहीं ह

देवव्रत चौहान New Delhi

Added: 11/10/09 1:42 PM GMT

आज के परिवेश में आईएएस की शादी आईएएस से, डाक्टर की डाक्टर से, वकील की वकील से, साफ्टवेयर इंजीनियर की साफ्टवेयर इंजीनियर से हो रही है, जो अधिक सफल हो रही है. गोत्र, जाति, संप्रदाय तत्कालीन समाज में सफल विवाह हेतु एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में प्ररंभ हुये जिन्हें रुढ़िवादिता के चलते अति आवश्यक माना जाने लगा, पर यह सच नही है

vivek ranjan shrivastava jabalpur भारत

Added: 11/10/09 10:54 AM GMT

यह सब समाज के अतिविकास का परिणाम है |बिना परिश्रम किये या बिना अच्छे कर्म किये जब एक निकृष्ट व्यक्ति को भी जब उसके लेबल के कारण समाज में आदर मिलने लग जाता है तो क्यों कोई इस लेबल सिस्टम में अन्य लेबल वालों को मिलने देगा फिर तो बहुत सारी चीजों का वीटो ख़त्म हो जाएगा, सब बराबर तो कौन किसका आदर करेगा? छोटा बड़ा यह सब सापेक्ष है

देवव्रत चौहान New Delhi

Added: 11/10/09 8:56 AM GMT

मेरे भाई बुद्धि है वो चीज़ है जो इंसान को जानवर से अलग करती है. शादी-व्याह में जाति, गोत्र का कोई महत्व पहले भी नहीं था और आज भी नहीं होना चाहिए.

Suresh Agrawal Kesinga,Orissa

Added: 11/10/09 8:47 AM GMT

हमें पश्चिम की नक़ल से बचना चाहिए. लेकिन किसी की आज़ादी पर ऐसे सवाल नहीं उठाने चाहिए. जाति, गोत्र और संप्रयाद का प्रयोग अगर सकारात्मक हो रहा है तो अच्छी चीज़ है.

himmat singh bhati jodhpur

Added: 11/10/09 8:47 AM GMT

बुद्धि और विवेक ही ऐसी चीज़ें हैं जो मनुष्य को पशु से अलग करती हैं. शादी में जाति और समुदाय की बात का भले ही कोई महत्व नहीं पर गोत्र महत्वपूर्ण तथा वैज्ञानिक होता है. यहाँ उड़ीसा में डॉक्टर मानते हैं कि शिकलिंग की बीमारी स्वगोत्र में शादी करने से अधिक सामने आती है. क्या चाचा-ताऊ आदि के बच्चों में शादी हो सकती है. अगर हाँ तो फिर सगे भाई बहनों में क्यों नहीं.

Suresh Agrawal Kesinga,Orissa

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