505 10 10 74 बीबीसी हिन्दी, सुनिए मोबाइल पर
इस बहस को सहेज कर रख लिया गया है – जवाब देने की अनुमति नहीं है

बच्चों पर कितनी सख़्ती जायज़ है?

ला मार्टीनेयर स्कूल के बारह वर्षीय छात्र रोवन रावला ने आत्महत्या कर ली. आरोप है कि स्कूल में हुई पिटाई और कक्षा से बाहर निकाले जाने से दुखी होकर उसने यह क़दम उठाया.

लेकिन रोवन रावला का मामला कोई अकेला क़िस्सा नहीं है.

पिछले साल अप्रैल में अंग्रेज़ी की वर्णमाला न जानने की वजह से दिल्ली के एक स्कूल में एक बच्ची को सज़ा दी गई. आरोप लगा कि इस सज़ा की वजह से ही उसकी मौत हो गई.

ऐसी ख़बरें स्कूलों से अक्सर आती रहती हैं.
 
लेकिन स्कूल में बच्चों पर की जाने वाली सख़्ती पर राय भिन्न-भिन्न है.

कुछ लोग सख़्ती के बहुत ख़िलाफ़ वो मानते हैं कि बच्चा फूल की तरह होता है उसे सहेज कर रखा जाना चाहिए. जबकि कुछ लोग मानते हैं बच्चा कच्ची मिट्टी की तरह होता है इसे ताप देकर पकाना भी पड़ता है.

तो बच्चों से स्कूलों में कैसा बर्ताव होना चाहिए? बच्चों पर कितनी सख़्ती जायज़ है? या सख़्ती होनी भी चाहिए या नहीं? बीबीसी इंडिया बोल में अगली बार बहस का विषय यही है.
 
इस पर आप क्या सोचते हैं, अपनी राय और प्रतिक्रिया हमें लिख भेजें. अगर आपके अपने कोई अनुभव हैं तो उससे भी हमें अवगत करवाइए.

18 जून, शुक्रवार, भारतीय समयानुसार रात आठ बजे हम आपके बीच फिर होंगे बीबीसी हिंदी की इस विशेष प्रस्तुति के साथ.

रेडियो कार्यक्रम में शामिल होने के लिए टोल फ्री नंबर 1800-11-7000 और 1800-102-7001 पर फ़ोन करके कार्यक्रम में लाइव शामिल हों. या एसएमएस करें 9999-6888-58 पर.

भारत के बाहर से जो लोग शामिल होना चाहते हैं, वे हमसे hindi.letters@bbc.co.uk पर संपर्क करें. आप टोल फ्री पर पहले से भी अपना संदेश रिकॉर्ड करा सकते हैं. इन्हें कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा. बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर दी गईं आपकी प्रतिक्रियाएं भी होंगी रेडियो कार्यक्रम का हिस्सा.

प्रकाशित: 6/16/10 6:03 AM GMT

टिप्पणियाँ

टिप्पणियों की संख्या:41

सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं

Added: 6/19/10 8:31 PM GMT

माता-पिता को बच्चों पर लगाम करने का माध्यम छड़ी नहीं बल्कि प्रेम होना चाहिए.

ANUPAM SHRIVASTAVA Bhopal

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 6/19/10 6:02 PM GMT

सख़्ती होनी चाहिए लेकिन इसकी सीमा तय होनी चाहिए. ज़ूरूरत से अधिक सख़्ती जानलेवा होती है इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए.

Ejaz Delhi

पसंद करने वाले 1 व्यक्ति

Added: 6/19/10 5:26 PM GMT

बच्चों पर देखे तो स्कूल में अध्यापक और घर पर मम्मी-पापा का दबाव पढ़ाई पर बहुत है और प्राईवेट स्कूल वाले बच्चों पर पुस्तक लाद देते है.

Sachin Meena Sewa

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 6/19/10 1:55 AM GMT

टीवी चैनलों ने बच्चों को काफी बिगाड़ दिया है. ऐसे में मां-बाप सख़्ती नहीं करेंगे तो फिर भगवान ही मालिक है देश के भविष्य का.

Bansi Butta Hermiston, OR

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 6/18/10 11:52 AM GMT

इतनी कम उम्र में किसी छात्र सिर्फ़ स्कूल की डांट के कारण इस तरह का क़दम नहीं उठा सकता. मेरे विचार से बच्चों पर सबसे अधिक सख़्ती घर वालों की तरफ़ से होती है. कोई छात्र पढ़ाई में कमज़ोर है और उसपर घर और क्लास दोनों तरफ़ से दबाव डाला जा रहा हो तो वो आत्महत्या के लिए विवश होगा ही. बस तो मैं यह ही कहना चाहता हूं कि केवल स्कूल के डांट के कारण कोई छात्र आत्महत्या नहीं कर सकता, परिवार भी इसके लिए ज़िम्मेदार है.

sachin deshwal shamli

पसंद करने वाले 1 व्यक्ति

Added: 6/18/10 11:21 AM GMT

किसी भी तरह अति ठीक नहीं है. बच्चों के साथ न तो जरूरत से ज्यादा सख़्ती न ही जरूरत से ज्यादा ढील ठीक है.

Afsar Abbas Rizvi "ANJUM" Greater Noida U.P

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 6/18/10 7:22 AM GMT

सख़्ती किसी पर भी तब तक जायज़ नहीं जब तक कोई व्यक्ति या संस्था देश, मानव समाज, परिवार या स्वयं के जीवन के लिए खतरा न बने. लेकिन आप इतिहास उठाकर देखेंगे तो पाएंगे कि भारत में 'सख़्ती' दबंगों पर न होकर सिर्फ कमजोरों पर ही होती रही है-चाहे वे बच्चे हों, कमजोर वर्गों के लोग हों, महिलाएं या निरीह जानवर ही क्यों न हों. यह 'सख़्ती' सिर्फ इन्हीं पर आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जारी है.

सिद्धार्थ कौसलायन आर्य ग्रेटरनौएडा-भारत

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 6/18/10 4:16 AM GMT

यह विषय हमारे मन के काफी करीब है. हमें अपना बचपन कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारा जिज्ञासु मन क्या-क्या सोचता था, हम कब बड़ों के व्यवहार से खुश या परेशान हो जाते थे, हमें क्या पसंद था और क्या नापसंद. इन सब को ध्यान में रखकर ही बच्चों से बर्ताव करें. कहीं पर भागदौड़ भरी जिंदगी की वजह से बच्चों पर ध्यान नहीं दिया जा पाता है, तो कहीं पर चौबिसो घंटे बच्चों पर निगाह रखी जाती है.

Abhay Singh Pune भारत

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 6/18/10 1:18 AM GMT

मेरा मानना है कि बच्चों के प्रति हमें सख्ती नहीं बरतनी चाहिए. खास तौर पर बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों को तो कतई नहीं-उन पर बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी होती है. अगर आप न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया और अमरीका जैसे पश्चिमी देशों पर निगाह डालें तो वहां पर पढ़ाई का तरीका बिल्कुल ही अलग होता है. बच्चों पर किसी तरह का दबाव नहीं होता है, उन्हें पढ़ाई में खासा मजा आता है. भारत में बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान दिया जाता है, न कि पश्चिमी देशों की तरह व्यावहारिक ज्ञान.

Rakhsha auckland, new zealand

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 6/17/10 6:59 PM GMT

कहा जाता है कि जो समय के साथ नहीं चलता, समय उसका साथ छोड़ जाता है. शिक्षा के विषय में पुरानी सोच को बदलने की आवश्यकता है और नए जमाने की शिक्षा प्रणाली के हिसाब से ही स्कूलों में बच्चों के साथ बर्ताब करना चाहिए. शारीरिक सज़ा आज के युग में कोई मायने नहीं रखती है हालाँकि इसके दुष्परिणाम सामने आते रहे हैं. अब न तो वो गुरुकुल रहे, न ही वे गुरुजन और न ही वैसे विद्यार्थी रहे. हाँ यह उस समय की ज़रुरत थी पर अब उस सोच से ऊपर उठने में ही भलाई है.

BALWANT SINGH HOSHIARPUR , PUNJAB भारत

पसंद करने वाले 1 व्यक्ति

Added: 6/17/10 5:30 PM GMT

बच्चों पर सख्ती सिर्फ डांट तक ही जायज है. इससे ज्यादा सख्ती बच्चों के मन पर गहरा असर करती है और बच्चे हीन भावना के शिकार हो जाते हैं, स्कूल में वह अन्य बच्चों की अपेक्षा खुद को कमजोर समझने लगता है. मेरा तो यह मानना है कि बच्चों को हल्के-फुल्के डांट और प्यार से समझा बुझा कर ठीक किया जा सकता है.

Krishna tarway Mumbai

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 6/17/10 3:18 PM GMT

आजकल के बच्चे बड़े जिद्दी होते हैं. टीवी के कार्यक्रम उन्हें और भी प्रभावित कर रहे हैं. टीवी के कार्टून देखने पर मना किया जाय तो वे नाराज हो जाते हैं. स्कूल में बच्चों के ऊपर कुछ सख्ती भी जायज़ है-भय बिन होई न प्रीति. स्कूल में भी कई तरह के बच्चे आते हैं. कुछ बदमाश किस्म के होते हैं और स्कूल का माहौल खराब करते हैं.

ishwar tiwari bilaspur,chhattisgarh

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 6/17/10 1:19 PM GMT

मेरा मानना है कि बच्चों के प्रति नरम व्यवहार अपनाना चाहिए. जहां तक पढ़ाई-लिखाई की बात है तो उन्हें उदाहरण देकर और शिक्षाप्रद कहानियां सुनाकर प्रेरित किया जाना चाहिए. माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों के साथ कुछ समय गुजारें और उनकी रूचि पढ़ाई की तरफ मोड़ें. माता-पिता को अपना भी मूल्यांकन करना चाहिए कि उनकी बदलती जीवन शैली से बच्चे किस तरह प्रभावित हो रहे हैं. माता-पिता को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वे अपने बच्चों की असल जिंदगी में पहले रोल मॉडल हैं.

B N Tiwari Bhopal

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 6/17/10 12:17 PM GMT

बच्चों पर सख़्ती इस सामाजिक व्यवस्था की नाकामी है, बच्चे सॉफ्ट टार्गेट होते हैं इसलिए उनपर नाकाम बड़े अपनी नाकामी का ग़ुबार निकाल लेते हैं. वे हमसे अच्छी उम्मीद लगा कर सवाल करते हैं जिनका जवाब हमारे पास नहीं हैं. बच्चे बड़ों से ज़्यादा सृजनशील चिंतक होते हैं, पर हम इनकी भावना को नहीं जान पाते हैं. बच्चे को देने के लिए उसकी चाहत के अनुरूप हमारी व्यवस्था के पास कोई विकल्प नहीं हैं, बच्चे की सोच अपार है, तो हमारी संकीर्ण. वह हम से बहुत चाहता है पर हमारे पास विचारों की कंगाली के सिवा कुछ नहीं.

ml gurjar udaipur

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 6/17/10 12:06 PM GMT

ये मुद्दा आज की ज़रूरत है हम भी अपने माता-पिता की किसी बात को न करना नहीं जानते थे पर हमारे बच्चों को हमने इतना सर चढा रखा है कि वो अपनी बातें हमसे मनवाते हैं. ग़लती शायद हमारी है. बच्चों की हर बात को मान लेना ठीक नहीं, जब हमें लगे कि ये उसके लिए ठीक है उसे वो करे. आज सूचना क्रांति के समय हम बच्चों को कैसे बुराइयों से बचाएं? शिक्षकों को भी ध्यान रखना होगा कि बच्चा किस परेशानी से गुज़र रहा है. आज भीड़ में उसे भी पहचान बनाने की मुश्किल है. अब तो लगता है हमारे माता-पिता का सख्त रहना अच्छा था.

seema singh lucknow

पसंद करने वाले 0 लोग

बीबीसी को जानिए

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.