505 10 10 74 बीबीसी हिन्दी, सुनिए मोबाइल पर
इस बहस को सहेज कर रख लिया गया है – जवाब देने की अनुमति नहीं है

आदिवासियों के प्रति उदासीनता?

छत्तीसगढ़ में बीजापुर ज़िले के एक गाँव में पिछले दिनों एक कथित मुठभेड़ में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस ने एक गाँव में छोटे बच्चों और औरतों सहित 19 लोगों को मार दिया और कहा कि वो सभी माओवादी थे.

गाँव वालों का कहना है कि वो निहत्थे थे और गाँव की समस्याओं पर बैठक कर चर्चा रहे थे. गृहमंत्री पी चिदंबरम ने पहले सीआरपी को बधाई दी पर फिर कहा कि अगर कोई निर्दोष लोग मारे गए हैं तो उन्हें अफसोस है.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने गाँव वालों की हत्या के लिए भी माओवादियों को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा कि वो आम लोगों को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं. कुछ मानवाधिकार संगठनों ने बयान ज़रूर दिए पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इस कांड को लेकर कहीं और कोई ख़ास हलचल नहीं हुई.

क्या भारतीय समाज आदिवासियों और उनकी समस्याओं के प्रति उदासीन है?

हमें अपनी राय लिखिए.

प्रकाशित: 7/5/12 2:40 PM GMT

टिप्पणियाँ

टिप्पणियों की संख्या:43

सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं

Added: 7/9/12 12:26 PM GMT

वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता
हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम

nitesh kumar basti

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/9/12 12:24 PM GMT

नक्सलवाद का जन्म सरकारी और सामाजिक उत्पीडन कि वजह से हुआ है.
मुझे लगता है कि, जब तक देश का नेतृत्व किसी दलित के हाथ में नहीं आएगा, तब तक नक्सलवाद ख़त्म नहीं होगा जैसे उत्तर प्रदेश में नक्सलवाद नहीं है.

BUDDHA VIKRAM SEN BASTI UP

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/9/12 12:04 PM GMT

माओवादियों को मारना इंसाफ नहीं है. यह घृणित कदम है. हिंसा कभी भी बर्दाश्त नहीं की जा सकती है चाहे वह माओवादियों की तरफ से हो या फिर पुलिस की तरफ से. और फिर यह कोई विदेशी नहीं हैं हमारे ही देश के लोग हैं इन्हें मारने के बजाय पकड़ा भी जा सकता था. लेकिन पुलिस ने इन्हें मारना उचित क्यों समझा? मेरे हिसाब से सरकारों को इन्हें एकजुट होकर पकड़ने, आत्मसमर्पण करने पर मजबूर करना चाहिए. सबसे बड़ी बात की ऐसे हालात न पैदा होने दें कि एक आम आदमी सरकार और पुलिस का दुश्मन बनें और उसे माओवादी नाम मिलें.

अमित कुमार राणाजी इंकलेव, नई दिल्ली

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/9/12 1:37 AM GMT

जब तक आदिवासियों का मानसिकता नहीं बदलती तब तक कुछ नहीं बदलेगा, हम इन लोगों का भला नहीं कर सकते. इसलिए पहली प्राथमिकता आदिवासियों की मानसिकता को बदलने को देना चाहिए.

Shekhar raj baronia Mauranipur

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/8/12 4:53 PM GMT

इसे समाज कि उदासीनता कह क्र मीडिया अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकता, आखिर वह लोग तो वही सोचेगें और कहेगें जैसी छवी मीडिया पेश करेगा.जिसे इस घटना को मीडिया ने शुरुवात में बेवजह पुलिसे की सफलता के तौर पर दिखाया इसे भारतीय मीडिया का चरित्र तो समझा ही जा सकता है, आज इसी का परिणाम है कि बहादुरी दिखाने वाले पुलिसवालों की इस कायरतापूर्ण घटना पर भी लोग दुविधा में हैं.

sekhar bharti bangalore

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/7/12 12:15 PM GMT

आखिर इन आम लोग पुलिस वालों पर फायरिंग क्यों की. क्या सीआरपीएफ़ के जवानों को गोली लगना पर्याप्त सबूत नहीं है. नक्सलवादी अपने चेहरे पर " मैं नक्सलवादी हूँ" लिख कर नहीं घूमता.

sanjit gurgaon

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/7/12 10:13 AM GMT

समाज सिर्फ आदिवासियों कि ही बल्कि सबकी समस्यायों के प्रति उदासीन है. हो हल्ला सिर्फ नेता करते हैं और वो भी अपने लाभ के लिए. सुरक्षा बल हमेशा मानवाधिकार उल्लंघन करते हैं चाहे राज्य की फ़ोर्स हो या केन्द्र की.
अगर माओवादी आम लोगों को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं तो क्या इससे आम लोगों की हत्या जायज़ हो जायेगी? जब किसी नेता या अफसर या विदेशी को ये लोग ढाल बनाते है तो उन्हें मरने के लिए क्यों नहीं छोड़ दिया जाता.
ये क्यों नहीं कहा कि इटली के नागरिकों के अपहरण के लिए मावोवादी जिम्मेदार है, हम क्या करें?

Mohammad Athar khan Faizabad Uttar Pradesh भारत

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/7/12 10:01 AM GMT

जब कोई पुलिसवाला मरता है तो एमनेस्टी या मानवाधिकार संगठन कुछ नहीं कहते, पर जब नक्सली मरता है तो उसे आम गावं वाला घोषित कर दिया जाता है. क्या पुलिसवालों को कोई सपना आयेगा कि यह आदमी नक्सली है और यह एक आम गावं वाला. किसी के चेहरे पर तो कुछ लिखा नहीं होता.

raj orrisa

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/7/12 8:51 AM GMT

हाँ इस देश में लोगों को आदिवासियों की कोई चिंता नहीं.पर अगर आप यह कहें कि नक्सलवादीयों को आदिवासियों की अधिक चिंता है तो आपको बताना होगा की कहाँ नक्सलवादीयों के मॉडल से आदिवासियों का विकास हुआ है. यह भी बताना होगा कि नक्सलवादीयों का मॉडल कितना टिकाऊ है.
जब युवा और विकासपसंद आईएएस अधिकारीयों का पहरण कर लिया जाता है तब हम यह कैसे कह सकते हैं कि नक्सलवादी विकास समर्थक हैं. सच यह है कि नक्सलवादी खुद अपने आप को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

Pranav Kumar Das Bhopal भारत

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/7/12 8:40 AM GMT

मैं आपसे पूरी तरह से सहमत हूँ. भारत से शालीनता पूरी तरह से गायब हो गई है. समाज का अर्थ जाति हो गया है. अगर कोई एक जाति कष्ट में है तो कोई दूसरी जाति उसके साथ नहीं खड़ी होती. राजनेताओं ने आदवासी लोगों को भी क्षेत्र के आधार पर बाँट दिया है. इसलिए अगर कहीं एक इलाके में आदवासी कष्ट में है तो दूसरे इलाके में आदवासी उसकी परवाह नहीं करता.

Chandan Gupta Ambikapur, Surguja(C.G.)

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/7/12 7:49 AM GMT

आज समाज उदासीन है आदिवासियों के मामले में शायद उनके रहने या ना रहने से किसी को फर्क नहीं पड़ रहा. लड़ाई किसी की भी हो दोनों ओर से वही मारे जाते हैं. उन्हें माओवादियों से भी डर है और सरकार के फ़ोर्स से भी. सरकार को यह स्वीकार करना चाहिए कि गाँव के गरीब आदिवासी मारे गए परंतु हमारे जवान इतने निर्दयी भी नहीं कि वो गांववालों पर बिना किसी वजह के गोली चलाएँ. सरकार को गांववालों के दिलों से डर को निकालना होगा तभी वो पुलिस का साथ देंगे. फ़ोर्स की लड़ाई की तकनीक भी उन्नत करें ताकि वो भी बेमौत न मरें.

Sandeep Mahato Bangalore भारत

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/7/12 7:14 AM GMT

कोई बस पुलिस वालों को ये समझा दे कि वो निरीह आदिवासीयों और नक्सलियों मे फर्क कैसे करे? जब भी कोई मुठभेड़ होती है और लोग मारे जाते है, उन्हें आम नागरिक बता दिया जाता है और मानवाधिकार वाले मैदान मे आ जाते हैं और इन्हीं मानवाधिकारों वाले लोगों के मुहं पर ताला लगा रहता है जब नक्सली निर्दोष लोगों को मुखबिर बता कर मौत की सजा देते है और पुलिस वालों को एम्बुस मे घेर कर मारा जाता है. अगर आप हिंसा के विरोध में हैं तो दोनो पक्षों की हिंसा का विरोध करना चाहिए.

विवेक दुबे बिलासपुर

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/7/12 7:13 AM GMT

विकास का लाभ सदैव मध्यवर्ग और पूंजीपति वर्ग को ज्यादा मिलता है. उसी के लिए गरीब आदिवासियों के इलाकों से संसाधनों को कब्जे में किया जाता है और इसी कथित विकास की आड़ में इस देश में अगर सबसे ज्यादा कोई विस्थापित हुआ है तो वो आदिवासी समुदाय है. आदिवासियों के हितों के लिए कई कानून बनाए गए हैं पर कभी भी उनका गंभीरता से क्रियान्वयन नहीं किया गया. वन अधिकार मान्यता कानून, आदिवासी स्वशासन कानून, और समता जजमेंट जैसे कई उदहारण हैं.

ml gurjar udaipur

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/7/12 7:08 AM GMT

हमले में कोई नेता या बड़े आदमी तो नहीं मरा गया था जो हंगामा हो?

Arun Chandigarh

पसंद करने वाले 0 लोग

Added: 7/7/12 7:04 AM GMT

भारतीय समाज क्या करे, ये तो आदिवासी क्षेत्रों में जाकर विकास तो करने से रही. ये काम को सरकार का है, वो भी भेदभाव की नीति अपनाते हुए वहाँ विकास के मामले में भेदभाव रखती है.

himmat singh bhati jodhpur

पसंद करने वाले 0 लोग

बीबीसी को जानिए

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.