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गृहिणियों को मिले वेतन?

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक महिला और बाल कल्याण मंत्रालय में एक प्रस्ताव पर विचार चल रहा है कि पति हर महीने गृहिणियों को वेतन दें. गृहिणियां हालांकि सीधे तौर पर घर में आर्थिक योगदान नहीं करतीं लेकिन घर के सारे काम काज का बोझ इन्हीं पर होता है. गृहिणियों को वेतन देने का प्रस्ताव कितना सार्थक है या फिर इससे पतियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा? अगर ये प्रस्ताव मंज़ूर हो जाता है तो इसे लागू करवाना कितना मुश्किल होगा? लिखिए अपनी राय.

प्रकाशित: 9/13/12 7:39 AM GMT

टिप्पणियाँ

टिप्पणियों की संख्या:56

सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं

Added: 9/18/12 10:02 AM GMT

..तो 'शादी' की जगह 'वेतन समझौता एग्रीमेंट' लेगा और शादी नामक संस्था का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा, क्योंकि ज्यादा वेतन मिलने की संभावनाओं के लालच में समझौते भी टूटेंगे. तो इसका परिवार को चलाने,माता-पिता,बच्चों और सगे-संबन्धियों के प्रति दायित्वों पर प्रभाव आज भले ही अज्ञात है पर नकारात्मक ही अधिक संभाव्य है.

सिद्धार्थ कौसलायन आर्य भारत

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Added: 9/17/12 8:29 AM GMT

हमारे देश में गृह स्वामिनी वेतन भोगी कर्मचारी नहीं हो सकती ,क्योंकि छोटे से छोटे काम में उसकी भावनाएं जुडी होती हैं,अतः उसको वेतन देना उसका अपमान है,हाँ उसको सम्मान मिलना चाहिए और उसकी क्षमता केअनुसार निर्णय लेने का अधिकार .

निशा मित्तल muzaffarnagar u p

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Added: 9/17/12 7:35 AM GMT

महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय में लगता है कि विलायत से पढ़कर आए लोगों की नियुक्तियाँ ज्यादा हो गई हैं। उनकी समझ भारतीय पारिवारिक मनोविज्ञान की तरफ मंद प्रतीत होती है। परिवार में हर किसी के अपने-अपने कर्तव्य होते हैं और उनके निर्वहन के लिए मानदेय की अभिलाषा भी हेय होती है। हो सकता है भविष्य में आप बच्चों के जेबखर्च की अल्पतम सीमा तय करना चाहें। इतनी महँगाई में सरकार की तरफ टकटकी लगाईं महिलाओं का मुँह पति की तरफ मोड़कर सरकार चाहती है कि साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे...।

स्वप्नेश चौहान नई दिल्ली

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Added: 9/16/12 12:46 PM GMT

यह एक बहुत ही जटील प्रश्न है तथा ईसके बारे मे अपनी पत्नी से मैने चर्चा किया तो ऊनका कहना था कि यह एक ऊच्चीत कदम है क्यो की पत्नीयो की भी कुछ ऐसे खर्च है जो पति से छुपा कर किया जाता है और पति के हीसाब से अलग है तो कुछ कठीनाई होती है अतः कुछ रुपये वेतन का नाम न देकर हाथ खर्च हो तो दोनो मे दरार की गुन्जायस कम हो जायेगी ।बरणा यह हमारे सामाजिक ढाचे को चरमरा देगा ।

R.Prasad Sharma Boniachaper (gopalganj) bihar भारत

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Added: 9/16/12 10:32 AM GMT

ये एक बहुत ही जटिल प्रश्न है. मैं पूरी तरह मानती हूँ की गृहणी अपनी पूरी जिंदगी घर की देखरेख में निकल देती है और कभी कभी घर वाले उसके काम के महत्त्व को कभी नहीं समझते. अगर गृहणी को घर के काम के पैसे दिए जाने लगे तो इसका मतलब अगर कल को वो काम करने लायक न रहे तो उसे घर से बाहर कर दिया जाए, उसको तो उसके काम के पैसे मिल गए थे ?घर आपसी समझ बूझ से चलता है, सिर्फ पैसों से नहीं.अगली चीज फिर ये होनी चाहिए की माँ बच्चे को पलती है तो उसके पैसे उसे दे दिए जाएँ.कितनी माएं अपने बच्चों से पैसे लेना पसंद करेंगी?

tapan martha new delhi भारत

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Added: 9/16/12 5:52 AM GMT

वेतन सेवक या सेविकाओं को दिया जाता है,जो अपना काम उसी रूप में करते हैं.हमारे देश में गृहस्वामिनी अपने घर के प्रति पूर्णतया समर्पित होती है,उसके सभी कार्यों में अपनत्व की मिठास और भावनाएं होती हैं,ऐसे में उसको वेतन देना उसका अपमान है.आवश्यकता है सम्मान प्रदान करने की और उसकी क्षमता के अनुसार उसको निर्णय लेने में छूट देने की.

निशामित्तल मुज़फ्फर नगर

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Added: 9/16/12 2:07 AM GMT

गृहस्वामिनी को वेतन देना उसका अपमान है क्योंकि वेतन भोगी तो सेवक या सेविका मात्र होते हैं.गृहणी के सभी कार्यों में उसकी भावनाओं ,स्नेह का जो भाव रहता है उसका मोल कौन चुका सकता है.वेतन देने से अच्छा है कि उनकी सामर्थ्य के अनुसार उनको निर्णय का अधिकार दिया जाय और उसको सम्मान और सहयोग मिले परिवार का

nishamittal muzaffarnagar (u p)

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Added: 9/15/12 5:20 PM GMT

इस प्रकार अगर नियम कार्यान्वित होते हैं तो घर परिवार में तनाव बढेगा पर हाँ उन परिवारों को इससे फायदा होगा जहां पति पैसों को ऐयाशी से उड़ाते हैं , बिना पत्नी और बच्चों के बारे में सोचे...

UDAY PANIGRAHI SUNDARGARH

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Added: 9/15/12 3:56 PM GMT

सरकार की चातुर्यता भरे इस कानून का स्वागत किया जाना चाहिए. अब पुरुष स्त्री को न सिर्फ घरेलू कार्य के बदले वेतन दे बल्कि यौन- सुख के भी पैसे दे. महिलाओं को बच्चे धारण करने के लिए पुरुषों से मातृ-शुल्क लेना चाहिए. और बच्चों को भी बड़े होने के बाद अपने माँ और बहन को देखरेख शुल्क देना चाहिए. इसी तर्ज पे बहने अपने भाइयों को राखी में सिर्फ राखी न बांध कर सुरक्षा- कर दें और बेटियां अपने पिता को देखरेख का कर दें. पति अब पत्नी से सुरक्षा-कर का हकदार हो जायेगा. फिर सरकार को भी 'आय-कर' के मद बढे मिलेंगे!

अजीत ओझा पटना

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Added: 9/15/12 3:38 PM GMT

कदम सही होगा,ऐसा करने से गृहणियोँ के मन में आत्मनिर्भरता बोध होगा. जो उन्हें आश्रिता के स्तर से ऊपर उठने में मदद करेगा.
Some financial freedom must be required for woman, which bring her some confidence in decision taking & feel her dignity in society.

B S Bisht Ghaziabad

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Added: 9/15/12 2:56 PM GMT

भरतीयों का दिमाग बहुत उपजाऊ होता है। उसमें तमाम किस्म के ख़यालात और ख़ुराफ़ातें पैदा होती हैं। जब ऐसे उपजाऊ दिमाग वाले देश के नीति-निर्धारक बन जाते हैं तो ऊपर वाला भी चकरा जाता है। भारत में विवाह भावनात्मक संबंधों पर टिका होता है और जब तक यह है पति-पत्नी की परिवार चलाने की सम्मिलित जिम्मेदारी होती है, जिसमें बुजुर्गों-बच्चों की देखभाल/परवरिश से लेकर सामाजिक सबंधों का निर्वाह तक शामिल है। गृहिणी के वेतन की बात करने के बात कई और सवाल उठेंगे यथा बच्चे-बुजुर्गों का खर्चा किसके जिम्मे और कितना?

योगेन्द्र जोशी वाराणसी भारत

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Added: 9/15/12 10:54 AM GMT

निहायत मूर्खतापूर्ण क़दम होगा. महिलाओं को संबल बनाने के लिए महिलाओं, पुरुषों और समाज तीनों की सोच में बदलाव लाने की ज़रूरत है. कानून बना देने से कुछ नहीं होगा. संभव है कि दिलों के रिश्ते के बीच क़ानून की दीवार आने से संबंधों में दरार आने लग जाए. ये सच है 90 फीसदी महिलाओं को आर्थिक आज़ादी नहीं है. लेकिन अत्याचार सिर्फ 10 फीसदी महिलाओं के साथ ही होता है. 10 प्रतिशत के लिए 90 फीसदी महिला-पुरुषों के बीच क़ानून खड़ा करना ठीक नहीं.

डजviresh new delhi

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Added: 9/15/12 10:53 AM GMT

निहायत मूर्खतापूर्ण क़दम होगा. महिलाओं को संबल बनाने के लिए महिलाओं, पुरुषों और समाज तीनों की सोच में बदलाव लाने की ज़रूरत है. कानून बना देने से कुछ नहीं होगा.संभव है कि दिलों के रिश्ते के बीच क़ानून की दीवार आने से संबंधों में दरार आने लग जाए. ये सच है 90 फीसदी महिलाओं को आर्थिक आज़ादी नहीं है. लेकिन अत्याचार सिर्फ 10 फीसदी महिलाओं के साथ ही होता है. 10 प्रतिशत के लिए 90 फीसदी महिला-पुरुषों के बीच क़ानून खड़ा करना ठीक नहीं.

डजviresh new delhi

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Added: 9/15/12 10:08 AM GMT

मेरे ख्याल है कि इससे पति पत्नी के बीच सेलरी निर्धारण के बिच तनाव पैदा होगा । यह भारत के लिये पुर्णतः अव्यवहारिक होगा । इससे मालकिन बनकर घर संभालने वाली पत्नी का दर्जा नौकर का हो जायेगा । यह महिलायो के हित नही अहित मे है ।

Raesh Ahamed Kushinagar

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Added: 9/15/12 5:14 AM GMT

इस महिला और बाल विकास मंत्रालय को क्या इस बात का पता नहीं इस देश की पारिवारिक व्यवस्था कैसे आदि काल से कैसे चली आ रही है. यहां की ग्रहणियों को वेतन देने का मतलब क्या यह मंत्रालय उन्हे नौकरानी का दर्जा देना चाहता है! इस मंत्रालय का यह मंसूबा यहां की समाजिक और पारिवारिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने वाला ही साबित होगा. भारतीय समाज के घेरुलू मामलात इस मंत्रालय का घुसपैठ करना सरकार के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा. इस देश की ग्रहणियां भी ऐसे किसी कानून खुद ही धज्जियां उड़ा देंगी.

Acharya Arun Kanpuri Ghaziabab. U.P. INDIA

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