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इस बहस को सहेज कर रख लिया गया है – जवाब देने की अनुमति नहीं है

कुछ कहने,लिखने की आज़ादी

फेसबुक पर शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को लेकर की गई टिप्पणी पर महाराष्ट्र में 21 वर्षीय शाहीन धाढ़ा और उनकी एक महिला दोस्त की गिरफ्तारी ने विचारों की स्वतंत्रता पर बहस छेड़ दी है.
शाहीन ने फ़ेसबुक पर लिखा था, "बहुत से लोग इस देश में पैदा होते हैं. उनकी मौत होती है. ऐसे लोगों के लिए बंद रखना कहां तक उचित है."
क्या ऐसा मात्र कह देने से पुलिस को ये हक मिल जाता है कि वो दो महिलाओं को गिरफ्तार कर लें?
शाहीन की इस टिप्पणी के आधार पर स्थानीय शिवसैनिकों ने उनके चाचा की क्लीनिक पर तोड़फोड़ की लेकिन पुलिस ने उनके खिलाफ कार्रवाई करने में उतनी तेजी नहीं दिखाई. भेजिए अपनी राय इसी विषय पर.

प्रकाशित: 11/20/12 10:31 PM GMT

टिप्पणियाँ

टिप्पणियों की संख्या:3

सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं

Added: 11/21/12 5:49 AM GMT

मुझे समझ नहीं आता कि बीबीसी या और हमारे देशा का मीडिया जो अपने आपको बहुत इज्जतदार और बड़ा महान समझते हैं, वो क्या दिखाना चाहते हैं. उन्होंने कुछ दिन पहले आई खबर की 'चिदंबरम का फोटो हवाईअड्डे पर खींचने पर गिरफ्तारी' इस समाचार को प्रमुखता क्यों नहीं दी? इससे ये समझ नहीं आता कि या ये तो जनता को मूर्ख समझते हैं या खुद को ज्यादा बुद्दिमान? मैं लिखने की आजादी का सम्मान करता हूँ.

Anuj delhi

Added: 11/21/12 5:15 AM GMT

ये हिंदुओं का देश बनता जा रहा है जहाँ मुसलमानों के खिलाफ कुछ भी हो सकता है.

MSHAH AL KHOBAR

Added: 11/21/12 4:48 AM GMT

बीबीसी को यह नैतिक हक भी नही है इस मुददे पर श्रोताओ के विचार मागने के क्योंकि डर के कारण बीबीसी ने शनिवार को अपने नियमित प्रोगाम की जगह पूरा समय मरहूम बाल ठाकरे पर दिया गया. साथ ही रविवार को जब उनका अंतिम संस्कार था तो बीबीसी ने शाहरूख खान का साक्षात्कार प्रसारित किया क्योंकि मरहूम ठाकरे व शाहरूख एक दुसरे के दुशमन यह बीबीसी ने ही बताया. क्यों यह मुददा बीबीसी उठाकर आग मे घी डालने का काम कर रही है. किसी बहिन या भाई को मुसीबत मे डालना चाहती है. किस देश के लिखने या कहने की आजादी की बात करती है बीबीसी.

SHABBIR KHANNA RIYADH ( SAUDIA ARABIA )

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