इस बहस को सहेज कर रख लिया गया है – जवाब देने की अनुमति नहीं है
मृत्युदंड है कितना जायज़?
मुंबई हमलों के लिए ज़िम्मेदार मोहम्मद अजमल कसाब से पहले पश्चिम बंगाल में एक लड़की के बलात्कार और हत्या के लिए धनंजय चटर्जी को 2004 में फाँसी दी गई थी. पर फाँसी देने का मुददा हमेशा बहस तलब रहा है.
हाल ही में भारत ने मृत्युदंड के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव का विरोध किया था.
अमरीका में मृत्युदंड दिया जाता है लेकिन कई विकसित जनतांत्रिक देशों में अपराधी को मौत की सज़ा दिए जाने का प्रावधान दशकों पहले ही ख़त्म कर दिया गया है.
क्या एक जनतांत्रिक देश होने के नाते भारत को भी यही रास्ता नहीं अपनाना चाहिए?
दीजिए अपनी राय.
प्रकाशित:
11/21/12 12:09 PM GMT
टिप्पणियाँ
टिप्पणियों की संख्या:22
सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं
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11/22/12 4:21 PM GMT
मानवीय सभ्यता के विकास के साथ दंड के रूप में बदलाव हुआ है. एक समय था जब आँख के बदले आँख और कान के बदले कान, दंड के मायने हुआ करता था. लेकिन आज मानवीय सभ्यता अपने विकास के उच्चतम बिन्दु पर मानी जाती है जहाँ मानव' एक लोकतांत्रिक समाज में साँसें ले रहा हैं. ऐसे समाज में सारे गतिविधियाँ चाहे वे सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक हो ; मानव को केंद्र में रखकर परखा जाता है. ऐसे में 'मृत्युदंड' मानवता और लोकतंत्र दोनों पर प्रश्न खड़ा करता है ,ऐसे स्थिति में हमें अन्य विकल्पों की तलाश करनी चाहिए.
jayprakash vidyarthi Delhi
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11/22/12 1:58 PM GMT
मृत्युदंड की सज़ा हर हाल में जारी रहनी चाहिए नहीं तो आतंकवादी गतिविधियाँ काफ़ी बढ़ जाएँगी.यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिए कि मृत्युदंड का प्रावधान सिर्फ़ उन्हीं लोगों के लिए न रह जाए जिनका राजनीतिक समर्थन करने वाला कोई न हो. मृत्युदंड के मुद्दे पर किसी प्रकार की राजनीति नहीं होनी चाहिए. तुष्टीकरण की नीति पर चलते हुए हमारे सत्ताधारी मानवता के दुश्मनों को न्यायालय द्वारा दंडित किए जाने पर भी मृत्युदंड को टालते हैं.
अमल कुमार विश्वास बरसौनी,पूर्णिया(बिहार)
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11/22/12 11:54 AM GMT
जो लोग मासूम और निर्दोष लोगों का खून बहाते है, जघंन्य अपराध करते है, उन्हें जेल मे रखकर उनकी खातिरदारी करना कहाँ का मानवाधिकार है.खुद भगवान राम और कृष्ण को रावण तथा कंस का वध करना पड़ा.दुष्टों का वध करने को मै कभी अपराध नहीं मानता.अगर अमन और शाँति लानी है तो ऐसे लोगों को जल्द से जल्द फांसी पर चढ़ाना होगा.भेड़ियों को खुला छोड़ना, पालना और पोसना मानवता नही है,वल्कि इन्हें फांसी दे देना ही मानवता है.जब मानव ही नही होगा तो काहें की मानवता.
लक्ष्मी कान्त मणि साँड़ी कलां, सिद्धार्थनगर, यूपी, भारत
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11/22/12 11:43 AM GMT
सवल का सीधा-सपाट उत्तर संभव नहीं. हर दंड के अनेकों पहलू होते हैं. किसी अपराधी को दंडित करके आप वस्तुतः उन लोगों को भी दंडित करते हैं जो उससे संबंध रखते हैं और जो उसके अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं होते, जैसे नादान बच्चे या वृद्ध मां-बाप. यह कहना भी सही नहीं कि मृत्त्युदंड का भय अपराधों को रोकता है. ऐसे भी अपराधी होते हैं जो जान पर खेलने को तैयार रहते हैं. मानव बम कौन बनते हैं? जहां कानूनी व्यवस्था कमजोर होती है वहां तो भय होता ही नहीं जैसे भारत में
योगेन्द्र जोशी वाराणसी भारत
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11/22/12 9:32 AM GMT
पता नहीं कौन कहाँ से एक शिगूफा छोड़ देता है और लोग बिना कुछ सोचे समझे उसकी हिमायत करते है, लोग भावनाओ में बहकर मौत की सजा को खत्म करने की बात करते है भावनाए तो उनकी पूछनी चाहिए जो हत्या , बलात्कार और दूसरे जघन्य अपराध के पीड़ित है जो पीड़ा ये लोग झेलते वो बयां नहीं की जा सकती है इस दुनिया में अच्छे लोग है बुरे भी और बुरे लोगो को सबक सिखाना जरुरी है बुरे लोगों की वजह से हर साल लाखों लोग अपनी जान गवांते है हत्या के आरोपी को जेल में रख सरकार क्यों जनता का पैसा ख़राब करे
a k
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11/22/12 9:14 AM GMT
अमरीका जैसे विकसित पचिश्मी देशों में फाँसी जैसी सजा का न होना समझ में आता है क्योंकि वह न केवल आर्थिक रूप से बलकि मानसिक रूप से भी विकसित हैं. जबकि भारत जैसे विकासशील देश अभी उस हद तक विकसित नहीं हुए हैं कि वह जघन्य अपराध अपने आत्म-बोध से ही छोड़ देंगे. इसलिए जब तक हम उस स्थिति को प्राप्त नहीं कर लेते, फाँसी को समाप्त कर देना तर्कसंगत नहीं होगा.
Yash Pal Singh Thakur Udhampur, Jammu & Kashmir
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11/22/12 7:27 AM GMT
वह व्यक्ति अपने जीने के मानवाधिकार को खो देता है जब वह किसी निरपराध मासूम की जान ले लेता है अतः मृत्युदंड का प्रावधान भयमुक्त समाज के हित में है
ANIL VERMA ETAH
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11/22/12 7:20 AM GMT
मनुष्य इस धरती पर सबसे अधिक समझदार व सबसे अधिक मूर्ख व खतरनाक जीव(जानवर)है,वह बेहद स्वार्थी कुदरती नियम-कानूनों तक की अवहेलना जान-बूझकर करता है.इस दुनिया और मानवता को सर्वाधिक खतरा भी इसी जीव से है.अतः इस 'जीव' को सख्ततम कानून/दण्ड की आवश्यकता है/रहेगी.
सिद्धार्थ कौसलायन आर्य भारत
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11/22/12 6:31 AM GMT
संयुक्त राष्ट्र में कई देश मृत्युदंड का विरोध कर रहे हैं. कसाब जैसे अपराधियों को सज़ा देने के लिए मृत्युदंड का प्रावधान ज़रूरी है. इसलिए मैं मानता हूं कि मृत्युदंड की व्यवस्था क़ानून में होनी चाहिए. इसके बिना हम समाज में आदर्श और शांतिपूर्ण स्थितियों की कल्पना नहीं कर सकते हैं. मृत्युदंड के प्रावधान से मानवाधिकारों का हनन नहीं होता.
Omprakash Godara Nakodesar Bikaner
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11/22/12 6:02 AM GMT
देश में इस समय कई घिनौने अपराधों के अपराधी कम सज़ा या कुछ सज़ा पाकर छूट चुके हैं. देश में बड़े अपराधों का ग्राफ़ तेज़ी से चढ़ा है. इसका मतलब है भारतीय न्याय प्रणाली और दंड संहिता का कमज़ोर होना. जब तक अपराधियों के मन में भय नहीं आएगा, अपराध में कमी नहीं होगी. फिर वह देश के बाहर का हो या देश का. इसलिए बड़े अपराधों के लिए फांसी ज़रूरी है.
Anurag Pare Indore
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11/22/12 4:34 AM GMT
मृत्युदंड उतना ही जायज़ है जितना जीने का हक़. क्योंकि किसी बेगुनाह को सोच-समझकर मौत के घाट उतारना और वो भी किसी साज़िश के तहत सबसे बड़ा गुनाह है. ऐसे काम को अंजाम देनेवाले को जीने का कोई हक़ नहीं है.
himmat singh bhati jodhpur
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11/22/12 2:54 AM GMT
आदमी को अपनी जान से ज्यादा प्यारी और कोई चीज़ नहीं होती. अतः फांसी ही अधिकतम संभावित सजा हो सकती है. भय की यह व्यवस्था बनी रहनी चाहिए भले ही इसका उपयोग हो न हो.
vivek ranjan shrivastava jabalpur भारत
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11/22/12 1:59 AM GMT
अगर इस बारे में पुख्ता सबूत हों कि किसी व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति की हत्या की है तो उसे जीने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए.
RS Tucson
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11/22/12 1:06 AM GMT
म्रुत्युदंड की सज़ा जारी रहनी चाहिए. इससे गुनहगारों में क़ानून के प्रति डर क़ायम रहेगा.
Vishal Mumbai
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11/21/12 7:23 PM GMT
किसी को जीवन या जन्म देने तथा किसी को मारने का अधिकार केवल ईश्वर के पास है. किसी मनुष्य के पास किसी को भी मारने का अधिकार नहीं है. हाँ कसाब जैसे दैत्य ने नरसंहार किया था लेकिन उसे मृत्युदण्ड से भी भयंकर सज़ा दी जा सकती थी.
Gopal Chandra Varanasi
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