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क्या कुंभ अब भी प्रासंगिक है?

क्या कुंभ अब भी प्रासंगिक है?

ऐसे समय में जब मनुष्य अपने बारे में इतना कुछ जान चुका है और विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है तब भी क्या यह अवधारणा सही है कि एक निश्चित समय में एक नदी में डुबकी लगा लेने से किसी का पाप धुल जाएगा.

क्या पाप और पुण्य की अवधारणा सही है?

क्या कुंभ जैसै मेले से पहले से प्रदूषित यमुना और गंगा पर प्रदूषण का और बोझ नहीं बढ़ जाता? या आपको लगता है कि धर्म और आस्था का मामला इस तरह के सवालों से ऊपर है? अपने विचार यहाँ लिखिए

प्रकाशित: 1/11/13 11:31 AM GMT

टिप्पणियाँ

टिप्पणियों की संख्या:59

सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं

Added: 1/18/13 12:04 PM GMT

पाप और पुण्य की अवधारणा प्रासंगिक तो नहीं ही है, हास्यास्पद भी है. दरअसल भगवान के अस्तित्व में विश्वास करने वाले धार्मिक लोगों के आचरण और तर्क ही इस पाप और पुण्य की अवधारणा पर सवाल खड़े करते हैं. अगर सब कुछ पहले ही से लिखा हुआ है, जैसा की कहा जाता है तो फिर पुण्य करने के बाद लिखा हुआ मिट जायेगा? आज के आधुनिक समय में भी निर्मल बाबा की सलाह के मुताबिक़ निश्चित संख्या में समोसे खाकर लोग पाप से मुक्त हो जाते हैं. अति हास्यास्पद. जी हाँ अति हास्यास्पद.

Dharambir Kumar Palakkad, Kerala

Added: 1/17/13 7:14 PM GMT

सवाल है, क्या कुंभ अब भी प्रासंगिक है? तो जवाब में बकरीद पर सवाल उठ रहे हैं. आखिर ये कौन सा तर्क है कुंभ के समर्थन में? क्या कुंभ इस लिए मनाया जाता है कि बकरीद मनाई जाती है? मुसलमान तो अपनी आय का ढ़ाई फ़ीसद ज़कात दे रहे हैं, बाकी लोग क्यों नहीं दे रहे हैं? अपनी आस्था की सार्थकता सिद्ध करनी होगी दुसरे के कार्यों का उदाहरण देने से बात नहीं बनेगी. अपने देश में भीड़ तंत्र है ही, जहाँ भीड़ हो जाएं बस वही सही है. ख़बरिया चैनल भी उसी की तरफ हो जाते है. भीड़ जो करे वही सही है. पीपली लाइव तो आप लोगो ने देखी होगी.

Mohammad Athar khan Faizabad Uttar Pradesh भारत

Added: 1/17/13 11:34 AM GMT

क्या आपने इस तरह का कोई सवाल कभी हज के लिए पूछा?

Kripal Singh Nainital

Added: 1/17/13 9:05 AM GMT

हमारे देश में बहुत ज़्यादा देवी देवता हैं जिनको हम मानते हैं. लेकिन किसी को पता नहीं कि इस बारे में किताबों में क्या लिखा है.

mange ram spain

Added: 1/17/13 5:37 AM GMT

आस्था रखना बुरी बात नहीं परन्तु महान संत स्वामी रविदासजी ने "मन चंगा तो कठौती में गंगा" कहावत को स्वयं सिद्ध करके भी दिखा दिया था लेकिन ठोंगी और पापी लोग यह बात समझते हुए भी तब से आज तक अनजान बने हुए हैं."मन गंदा तो हर काम गंदा,हर तीर्थ गंदा हर नाम गंदा" और "मन चंगा तो कठौती में गंगा" .

siddhartha arya Greater Noida भारत

Added: 1/17/13 2:53 AM GMT

कुंभ आज भी प्रासंगित है क्योंकि इससे समाज में एकता (संगठन) आती है. लोगों को मिलने जुलने का मौका मिलता है.

VINOD KUMAR DWIVEDI GONDA

Added: 1/16/13 11:09 AM GMT

बात मान लेने की है. अगर लगता है कि पाप हुआ है तो हुआ है, नहीं तो नहीं. एक बार एक साधु ने कहा था कि हमें ईश्वर ने इस धरती पर मानव का भला करने के लिए भेजा है. तो हम लोग उधर ध्यान लगाने की बजाए इधर क्यों उलझते जाते हैं?

Gharu Sangrur

Added: 1/16/13 8:01 AM GMT

ये बीबीसी वाले इसाई संस्थाओ से पेसे खाके .. भारतीय सभ्यता संस्कृति से लोगो का विश्वास उठाना चाहते हैं।।। ये मीडिया वाले दीपवाली के दिन पूरी रात ये बहस दिखाते हे की क्या माता लक्ष्मी सच में किसी के घर में प्रवेश करेगी? अब कुम्भ आया तो आस्था और अंधविश्वास की बहस कर रहे हैं ... लेकिन कभी इस बात पर बहस नहीं होगी की सांता क्लोज वास्तव में कभी था या नही .... क्यों ये दोहरी मानसिकता? मुस्लिम बकरीद के दिन निर्दोष पशुओ की बलि देते हे उसका कोई औचित्य है क्या? इस पर क्यों कोई बहस नहीं होती?

ANKIT D Bangalore

Added: 1/16/13 7:36 AM GMT

लाखों लोगों के नहीं आने से प्रदूषण रुक जाएगा ऐसा तो नहीं है. प्रदूषण रोकने के लिए दूसरे उपाय किए जाने चाहिए. ये तो लोगों की धार्मिक भावनाएँ हैं, इनका सम्मान होना चाहिए.

manish joshi sojat road

Added: 1/16/13 7:34 AM GMT

आप सब से अनुरोध है कि यिस समय आप इन बातो पर विचार-विमर्श न करें. आप खुद क्यों नहीं डुबकी लगा लेते हैं पावन कुम्भ में. फिर वहाँ जाकर आलोकिक अपने आपको महसूस करेंगे. निरर्थक बात नही करना चाहिए किसी धर्म के बारे में.

ravi shankar thakur noida

Added: 1/16/13 3:51 AM GMT

सभी टिप्पणियों को पढ़ा । सभी अध्यात्मिक विपरीत ज्ञान मे ढृढ् व्यक्तियो द्वारा की गई है। नदियो के संगम पर स्नान कर अमृत पाने की इच्छा रखने वाले करोडों लोग अघ्यात्मिक अज्ञानी है । अपना जीवन ईष्या, द्वेष , छल , कपट , धोखाधडी मे बिताने वाले लोगो के लिए अमृत नही है । अमृतपान करने का एक विशेष तरीका है। यह सदा गुप्त था, है, और आगे भी गुप्त रहेगा।

रवि नन्दन पटना

Added: 1/15/13 6:35 PM GMT

ये सही है कि डुबकी लगाने से पाप नहीं धुलेंगे लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि कुंभ प्रासंगिक नहीं है. कुंभ धार्मिक और वैचारिक मंथन है. इस तरह के पर्व हमें आध्यात्मिक चिंतन का अवसर देते हैं. हालाँकि बदलते समय के साथ साथ कुंभ के स्वरूप में भी परिवर्तन होना चाहिए.

Vijay Singh kota भारत

Added: 1/15/13 5:02 PM GMT

हिन्दुओं की आस्था और विश्वास का एक बड़ा केंद्र कुभ है | भारत में मुस्लिम आक्रंताओ ने हिन्दुओं को मुसलमान बनने के लिए हत्या कर देते थे | हिन्दुओं ने अपनी संस्कृति को बच्चे के लिए तथा पूरे भारत को एक सूत्र में जोड़ने ले लिए एक स्थान पर सभी लोगों को इकठ्ठा किया | इसके लिए चुने हुए संतो को पवित्र स्थान पर लाकर अपनी संस्कृति पर हो रहे हमला कैसे रोके और सुरक्षित कैसे करे | इस प्रकार १००० वर्षो कुंभ में आये हुए संत जब अपने क्षेत्र में जाकर आज भी हिंदुत्व की रक्षा कर रहे है |इसकी प्रासंगिता आज भी है.

रमाशंकर रायपुर

Added: 1/15/13 2:12 PM GMT

अलग अलग लोगो की नजर से देखे तो अलग अलग महत्त्व है महाकुम्भ का
1 .सरकार के लिए एक अच्छा व्यवसाय..1200 करोड़ रुपये लगा कर 12000 करोड़ रुपये की आमदनी साथ में वोटो का भी लालच.
2 . विदेशियों के लिए कौतूहल का विषय साथ में सैरसपाटा व मौजमस्ती फ्री.
3 .अखाड़ो के लिए शक्तिप्रदर्शन का अवसर.
4 . दो महीने के लिए रोजगार पाने वाले व्यक्तियों के लिए कम समय के लिए ही सही रोज़गार का एक अवसर.
5 .उच्चवर्गीय भारतीयों के लिए पिकनिक.
6 .निम्नवर्गीय व मध्य निम्नवर्गीय भारतीयों एवं सच्चे संतो के लिए आस्था का महासमागम.

Sumit Kumar Faculty of Law, BHU, Varanasi भारत

Added: 1/15/13 1:46 PM GMT

कुंभ में गंदगी फैलाने वाले आसपास के लोग और कल-कारख़ाने हैं. गंगा में डुबकी लगाने वाले तो दूध और पुष्प चढ़ाते हैं. धूप-अगरबत्ती करते हैं जिससे वातावरण शुद्ध होता है और पानी भी. यहाँ कमाई की आस भी सभी जाति और धर्म वाले रखते हैं.

himmat singh bhati jodhpur

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