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इस बहस को सहेज कर रख लिया गया है – जवाब देने की अनुमति नहीं है

अभिव्यक्ति पर सवाल?

समाजशास्त्री आशीष नंदी के पिछड़ों और अति पिछड़ों पर दिए कथित बयान ने एक बार फिर से अभिव्यक्ति की आज़ादी का मुद्दा गरमा दिया है.

आशीष नंदी ने जयपुर साहित्य महोत्सव में भ्रष्टाचार और दलितों पर अपने बयान को कुछ इस ढंग से पेश किया था कि कुछ लोगों को लगा था कि वो कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार के मामलों में सबसे अधिक दलित ही शामिल होते हैं.

उनके इस बयान की जमकर आलोचना हुई और उनके खिलाफ़ मामला भी दर्ज किया गया. उधर विवादित लेखक सलमान रूश्दी ने ट्विट किया है कि कोलकाता पुस्तक मेले में उन्हें हिस्सा लेने से रोकने के लिए राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रशासन और पुलिस को आदेश दिए थे.

बुद्धिजीवियों के बयान पर हंगामा क्या कहीं अभिव्यक्ति की आज़ादी के स्पेस को कम कर रहा है या फिर लोगों में कथित विरोधी विचारों को पचाने की क्षमता कम हो गई है.

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प्रकाशित: 2/1/13 3:20 PM GMT

टिप्पणियाँ

टिप्पणियों की संख्या:19

सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं

Added: 2/2/13 2:22 PM GMT

आशीष नंदी के विचार पर हायतौबा और मुकद्दमेबाज़ी की बजाय सार्थक बहस होनी चाहिए. जिस देश में विचार और विचारकों का सम्मान हुआ वही समाज मजबूत हुआ. वैचारिक स्वतंत्रता का नाम ही लोकतंत्र और आजादी है. परतु विचारकों को भी सिरफ़िरे तत्वों को हावी होने का मौका देने से बचना चाहिये. देश काल का जरुर ख्याल रखा जाना चाहिये.

DR. RAJA RAM AGARWAL Fatehabad भारत

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Added: 2/2/13 9:29 AM GMT

आशीष नंदी के विचार पर बहस होनी चाहिए न की मुकदमा. नंदी एक विचारक हैं वे अपनी बात निःसंकोच रखते हैं. नंदी के ब्यान को अगर हम अपनी निंदा समझते हैं तब हमें निंदक नियरे राखिये आँगन कुटीर छवाए की तरह सम्मान करना चाहिए. जिस देश में विचारकों का सम्मान हुआ वहाँ समाज मजबूत हुआ. कबीर, तुलसी जैसे संतों की स्पस्टवादिता जग जाहिर रही है .

pramodkunar mujffrpur

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Added: 2/2/13 8:52 AM GMT

जाके पांव न पड़ी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई.
कुछ दिन पूर्व संघ प्रमुख मोहन भागवत के सिलचर और इंदौर के भाषणों को बिना पूरा सुने निरर्थक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया गया. लेकिन अब आशीष नंदी के जयपुर वक्तव्य के बारे में उनके समर्थक लेखक व पत्रकार कह रहे हैं कि उनके बयान को पूरा और सही संदर्भ में समझना चाहिए. किसी ने ठीक ही कहा है - जाके पांव न पड़ी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई.

vijai kumar Delhi

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Added: 2/2/13 7:58 AM GMT

हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं. यहां किसी को भी अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है. लेकिन अपने विचार अभिव्यक्त करते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी बात से किसी धर्म या किसी विशेष वर्ग की भावना तो आहत नहीं हो रही है. हमारे यहां सभी वर्गों का सम्मान होता है. जहां तक आशीष नंदी के मामले का सवाल है उन्होंने माफी मांग ली है. इस मामले को अब ज़्यादा तूल नहीं दिया जाना चाहिए.

vijay yadav siddharthnagar

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Added: 2/2/13 7:42 AM GMT

निश्चित ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, पर इसका मतलब ये तो नहीं है कि हम बिना तार्किकता के कुछ भी बोल दें. सदियों से समाज के जिस वर्ग का शोषण होता आया है, उसे ही समाज में सबसे अधिक भ्रष्ट बताना कहां तक न्यायसंगत है? नंदी साहब आप कह रहे हैं कि मीडिया ने आप की बात को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है पर ऐसा लगता है कि क़ानूनी कार्यवाही के डर से आप अपने बयान को गोलमोल घुमा रहे है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आपको समाज के शोषित व पिछड़े वर्गों को अपमानित करने का लाइसेंस नहीं देती है.

Sumit Kumar Faculty of Law, BHU, Varanasi भारत

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Added: 2/2/13 6:13 AM GMT

हमारे देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी तो है पर उसके मानदंड सबके लिए अलग-अलग हैं. अभिव्यक्ति की आज़ादी संविधान ने तो दी है पर ये भी देखा जाता है कि उस आजादी को इस्तेमाल करने वाला कौन है, वोटतंत्र का ग्रहण सब पर भारी है.

इकरामुद्दीन डायर Abu Dhabi संयुक्त अरब अमीरात

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Added: 2/2/13 4:52 AM GMT

कभी-कभी सुलझे हुए विचारक भी अपनी बात स्पष्ट नहीं कर पाते हैं. आशीष नंदी भी संदर्भ के अनुसार बात को नहीं कह सके. यदि नंदी समाजिक न्याय के पैरोकार हैं तो उन्हें समाज से अपनी गलती के लिए माफी मांगनी चाहिए. सरकार को लोगों के मौलिक अधिकार की रक्षा करनी चाहिए. हरेक बात को तूल देकर राजनीति नहीं करनी चाहिए. व्यक्तिगत राय को सुनना चाहिए. यदि कोई गैर जिम्मेदाराना बात कहता है तो उस शख्स की साख भी दाव पर लगती है. समाज कई विचारों को अपने में समेटा हुआ है और सामाजिक जड़ता से बचने के लिए विचारों का आना जरुरी है.

shantanu srivastava noida भारत

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Added: 2/2/13 4:33 AM GMT

क्या इसमें कोई शक है कि भारत में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर नहीं है? नेताओं, अदालतों, सरकारी कार्यालयों, अफसरों या कर्मचारियों द्वारा जमकर सुविधा शुल्क लिया जाता है. अब क्योंकि दलितों को आरक्षण का फायदा मिल रहा है, इसलिए हर क्षेत्र में इनकी मौजूदगी है. तो जाहिर है सुविधा शुल्क भी इनके पास अधिक ही जायेगा. सच्चाई यह कि शायद भारत में कोई भी ईमानदार नहीं बचा है. सब किसी ना किसी रूप में जेब भरने में लगे हैं.

SHABBIR KHANNA RIYADH ( SAUDIA ARABIA )

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Added: 2/2/13 3:03 AM GMT

आशीष नंदी दलितों के हितैषी माने जाते हैं. उन्होंने जयपुर साहित्य सम्मेलन में जो बयान दिया वो किस संदर्भ में दिया और उसका क्या मक़सद था - इसको समझे बिना हंगामा खड़ा कर दिया गया जो दुर्भाग्यपूर्ण है. अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए ये ठीक नहीं है. लेकिन सच ये है कि उच्च स्तर पर ज़्यादा भ्रष्टाचार व्याप्त है जिसका जाति से कोई संबंध नहीं है. बंगाल में सलमान रुश्दी को कोलकाता पुस्तक मेले में हिस्सा लेने से रोकना भी ममता बनर्जी की संकीर्ण सोच को दर्शाता है.

Omprakash Godara Nakodesar, Bikaner

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Added: 2/1/13 8:53 PM GMT

लोगों में विरोधी विचारों को पचाने की क्षमता कम है. ताकतवर तो बिलकुल नहीं पचाता और जो कमज़ोर है उसे मजबूरी में पचाना पड़ता है. यहाँ कानून भी सबके लिए अलग अलग है. जैसे तोगड़िया अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन ओवैसी नहीं. अभिव्यक्ति की आजा़दी होनी चाहिए लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप किसी को गाली दें या अपमानित करें. अभिव्यक्ति की आजा़दी का इस्तेमाल हमेशा से हुकूमत के खिलाफ सच बोलने के लिए होता आया है, किसी धर्म का अपमान करने के लिए नहीं. खबरिया चैनल मिर्च मसाला लगाकर आग में घी डालने का काम करते हैं.

Mohammad Athar khan Faizabad Uttar Pradesh भारत

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Added: 2/1/13 6:47 PM GMT

हम एक लोकतंत्र में जी रहे हैं जिसमें हमें अभिव्यक्ति की पूरी स्वतन्त्रता है. लेकिन इस स्वतन्त्रता का दुरुपयोग समाज के किसी तबके अथवा समुदाय की भावनाओं को आहत करने में ना करके किसी मुद्दे पर एक स्वस्थ बहस करने की आवश्यकता है. इस बयान को इसके पूरे प्रसंग में देखे जाने की आवश्यकता तो है ही, साथ ही साथ हमें इस पर उग्र होने के बजाय संयम एवं तार्किकता के साथ विचार करना होगा.

prafull hyderabad

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Added: 2/1/13 6:44 PM GMT

संविधान के अनुच्छेद 19(1) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ 19(2) में इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन का प्रावधान है. ऐसे ही मानवाधिकारों की सार्वभौमिक धोषणा के अनुच्छेद 29 में भी इस स्वतंत्रता को सीमित करने की छूट दी गई है.
आशीष नंदी के बयान का अधिकतर विद्वानों ने समर्थन किया है लेकिन उनके कथन को एक बार सुनने में तो नंदी से सहमत होना असहज करता है. लेकिन व्यापक रुप से उनकी सोच सही है. यहाँ मैं समाज में बढ़ती असहिष्णुता से सहमत हूँ. लोग अपने स्वाद से इतर कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं जिसमें राजनीति एक और 'छौंक' लगा देती है.

अमित भारतीय जालौन (उo प्रo) भारत

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Added: 2/1/13 6:41 PM GMT

अब इसके लिए सिर्फ जनता को दोष देना ठीक नहीं लगता. जब जनता बुद्धजीवियों का विरोध करे तब उस पर असहिष्णु होने का तमगा दे दिया जाता है लेकिन जब यही बुद्धजीवी जनता की बातों को अनसुना करउसे भीड़तंत्र की अप्रत्यक्ष संज्ञा दें तब आखिर वो जनता क्या करे? तथाकथित बुद्धजीवियों और जनता दोनों को चीजों को व्यापक रुप से लेने की जरुरत है, साथ ही ऐसी बातों से एकदम बचा जाना चाहिए जिनके विरोधाभाषी अर्थ हों. वरना अर्थ का अनर्थ होना निश्चित है.

अमित भारतीय जालौन (उo प्रo) भारत

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Added: 2/1/13 6:40 PM GMT

ये हमारी अभिव्यक्ति की आजादी का हनन है. एक तरफ हम समानता की बात करते हैं दूसरी तरफ हम एक जाति विशेष को इतनी ज्यादा अहमियत देते हैं कि उसके खिलाफ एक शब्द भी बोलने पर गैर ज़मानती वारंट निकल जाता है. ये कैसी समानता है.

amit shukla noida

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Added: 2/1/13 6:22 PM GMT

किसी मंच से की गई प्रत्येक अभिव्यक्ति में एक अस्पष्ट सा कड़वा सच छिपा होता है जिसे पूरी तरह जानने-समझने की कोशिश ही नहीं की जाती और उस पर हंगामा खड़ा कर दिया जाता है. समाज में भी कदम-कदम पर प्रकारान्तरों से सच्चाई को झूठे अहम और ढोंगी-स्वार्थों से भरे बनावटीपन के आगे उपहासित होकर झुकना और हारना देखा-सुना और महसूस किया जा सकता है. गलत करने वाले को गिरा हुआ आदमी या एक शब्द में दलित नहीं तो क्या देवता, भगवान, परमात्मा या परमेश्वर शब्द दिया जाना उचित होगा.

जतीश कोटा

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