इस बहस को सहेज कर रख लिया गया है – जवाब देने की अनुमति नहीं है
बजट से क्या पूरी हुईं उम्मीदें?
वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने गुरूवार को आम बजट पेश किया. उसमें उन्होंने महिलाओं के लिए बैंक से लेकर शिक्षा क्षेत्र में और अधिक पैसे देने का प्रस्ताव रखा गया है.
उद्योग जगत ने इस बजट को काफ़ी सराहा है तो कुछ लोगों का कहना है कि रोज़गार पैदा करने के मामले में ये बजट नकारात्मक है.
तो फिर क्या सोचते हैं आप? क्या बजट से आपकी जो आशाएं थीं उसे इस बजट ने पूरा किया? लिखिए अपनी राय.
प्रकाशित:
2/28/13 12:26 PM GMT
टिप्पणियाँ
टिप्पणियों की संख्या:14
सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं
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3/1/13 6:09 PM GMT
यह बजट गरीबों को कम अमीरों को ज्यादा ध्यान में रख कर बनाया गया है. सरकार को देश के गरीबों और मध्यम वर्ग का विशेष ध्यान रखना चाहिए था जो कि नहीं किया गया है.
सतीश चन्द मद्धेशिया गोरखपुर
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3/1/13 3:07 PM GMT
जनता को सबसे बड़ी अपेक्षा थी कि सरकार महंगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और महिलाओं के प्रति हिंसा को कम करने का प्रयास करेगी, आर्थिक विकास तेज़ करेगी, कृषि और उद्योग को बढ़ावा देगी लेकिन सरकार ने ऐसा कोई काम नहीं किया है.
Omprakash Godara Nakodesr Bikaner
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3/1/13 2:29 PM GMT
बजट औसत है जिसमें ज़्यादा चुनावी रंग भी नहीं है. वैसे आशाएं कभी भी पूरी नहीं होतीं. लोकलुभावन घोषणाओं से देश पर ही आर्थिक भार पड़ता है और जिनके लिए ये घोषणाएं की जाती हैं उन तक योजना का घन कभी नहीं पहुंच पाता, बीच में ही ग़ायब हो जाता है. महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी को दूर करने के लिए सरकार ने कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया है.
Omprakash Godara Nakodesar Bikaner
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3/1/13 11:18 AM GMT
ये बेहद ख़राब बजट है.
Sandeep Barala Jaipur
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3/1/13 9:53 AM GMT
एक और बजट. हर साल बजट पेश किया जाता है और इससे जुड़े हुए लोग अपने-अपने राजनीतिक रुझानों के अनुसार ओपिनियन देते हैं. वित्त मंत्री और सत्ताधारी दल वादे करते हैं और बड़ी उम्मीदें जगाते हैं. लेकिन ये तज़ुर्बे की बात है कि ऐसे वादे हकीकत में पूरे नहीं होते.
Navinchandra Dave Vadodara-Gujarat
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3/1/13 7:35 AM GMT
ये बजट कर-चोरी और कालाधन लाने जैसे मुद्दे पर खामोश है. भ्रष्टाचार पर नकेल न कसने की वजह से यह बजट मात्र नेता, नौकरशाह और पूँजीपतियों का बजट है. देश का प्रत्येक व्यक्ति प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से कर देता है, लेकिन ग़रीब और आम आदमी का हक़ हमेशा मारा जाता है. बजट से मात्र 10 प्रतिशत लोगों को फायदा होता है, बाकी अपने हिस्से की रोटी अप्रत्यक्ष कर के रूप में दे देते हैं जैसे बिक्री कर, उत्पाद कर,सेवा कर इत्यादि.
लक्ष्मी कान्त मणि साँड़ी कलां, सिद्धार्थनगर, यूपी, भारत
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3/1/13 6:33 AM GMT
बजट का स्वागत उद्योग जगत ने किया है क्योंकि बजट उन्हीं के लिए है. आम आदमी तो टैक्स चुका रहा है. बजट पूरी तरह से आम आदमी विरोधी है.
praveen tripathi muscat ,oman
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3/1/13 5:46 AM GMT
ये कुल मिलाकर सही बजट है. लेकिन रक्षा बजट में बढ़ोतरी को मैं ठीक नहीं मानता. इन पैसों को विकास कार्यों में लगाया जा सकता था.
nandgopal raju Chennai भारत
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3/1/13 5:24 AM GMT
ये कुल मिलाकर अच्छा बजट है. लेकिन रक्षा बजट में बढ़ोतरी मुझे अच्छी नहीं लग रही. इस पैसे को विकास कार्यों में लगाया जा सकता था.
N RAJU Chennai
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2/28/13 5:55 PM GMT
इस बार का बजट युवा वर्ग की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है. राष्ट्रीय कौशल पाठ्यक्रम का निर्माण इस दिशा मे एक सकारात्मक पहल है, लेकिन युवाओं के रोजगार के अवसर पर बजट खामोश है. चिदम्बरम साहब द्वारा पेश किया गया यह बजट बिलकुल ही फ्लैट नज़र आता है. खाद्य सुरक्षा बिल के नाम पर 10,000 करोड़ की रकम काफी कम मालूम पड़ती है, वहीं देशी निवेशकों की उम्मीद भी इस बजट से टूटती दिख रही है. मुझे तो यही लग रहा है कि यह बजट चुनावी रंग से दूर वित्तीय घाटे को और बढ्ने से बचाने वाला है.
prafull kumar hyderabad भारत
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2/28/13 4:03 PM GMT
किसी राष्ट्र का आर्थिक शोषण करनेवाले बाज़ारवाद के दबाव में आर्थिक अत्याचार का प्रत्यक्ष प्रमाण है ये बजट.
Ramesh Vyas. Indore.
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2/28/13 1:58 PM GMT
बस ये वार्षिक बजट है जिसे चिदंबरम ने पेश कर दिया बाकी और कुछ भी नहीं है. गरीब, किसान, एनआरआई, युवा, विद्यार्थी को कुछ नहीं मिला है. लगता है वित्त मंत्री चिदंबरम ने बजट की अलग कॉपी पढ़ दी है.
हसन जावेद काशीबाड़ी, किशनगंज
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2/28/13 1:55 PM GMT
बजट महज सरकारी औपचारिकता ही कहा जा सकता है, जनअपेक्षाओ के बिलकुल विपरीत है.
vivek ranjan shrivastava jabalpur भारत
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2/28/13 1:48 PM GMT
"आपका बजट, आपके हाथ" से भाषण की शुरुआत से वित्तमंत्री के इरादे स्पष्ट हैं. मनरेगा के अलावा अन्य फ्लैगशिप कार्यक्रमों में धन का आवंटन बढ़ा है. कर में मामूली छूट और महिलाओं संबंधी प्रावधान से मध्यम वर्ग को खुश करने की कोशिश है. साथ में कॉरपोरेट को भी निराश न कर सबको साथ लेने की कोशिश की गई है. बढ़ते राजकोषीय घाटे के बावजूद सामाजिक कार्यों पर खर्च बढ़ाना और कर की दरों में भी कोई बदलाव न करना समझ से परे हैं अंत में कमर तोड़ती महंगाई से निज़ात न मिलना चुनावी लक्ष्य में बाधा बन सकता है.
अमित भारतीय जालौन (उo प्रo) भारत
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