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आर्थिक मंदी का दौर और आप...

दुनियाभर में जो एक संकट हर ओर लोगों की ज़िंदगियों को प्रभावित करता नज़र आ रहा है, वो है आर्थिक मंदी का. कुछ देश इसकी चपेट में हैं. कुछ इससे प्रभावित. अर्थव्यवस्थाएं सभी ओर चुनौतियाँ झेल रही हैं.

ऐसे में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस एक पूरी श्रंखला के ज़रिए आर्थिक मंदी से जुड़े सवालों, मुद्दों को आपके सामने लाने की कोशिश कर रहा है. इस श्रंखला की पहली कड़ी में हम आपसे रूबरू हैं भारत के लोगों की नौकरियाँ जाने, मंदी के दौर में मकानों के बाज़ार की बदलती स्थिति और बाहर से आने वाले पैसे के बारे में.

निर्यात से लेकर छटनी तक कम होती नौकरियाँ, बड़े महंगे घरों के सपने से लेकर कुछ नीचे आते दामों वाले मकानों का नया पनपता बाज़ार और भारत के विदेशों से वापस लौटते लोग, वहाँ से आने वाले पैसे की आमद पर असर... इन तमाम मुद्दों पर आपका अनुभव या राय क्या हैं.

आपकी नज़र में ये मुद्दे भारत की अर्थव्यवस्था को किस तरह प्रभावित करते हैं. क्या सोचते हैं आप इनसे उबरने के विकल्पों के बारे में और क्या इन सवालों पर आप भारत सरकार की ताज़ा नीतियों, क़दमों से सहमत हैं, अपनी राय से हमें ज़रूर अवगत कराएं.

प्रकाशित: 6/18/09 3:15 AM GMT

टिप्पणियाँ

टिप्पणियों की संख्या:29

सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं

Added: 6/21/09 7:29 PM GMT

मृग के नाभि मांहि कस्तूरी, वन वन खोजत तासि....
भारत जैसे देश के लोग जहां विकास की असीमित सम्भावनाएं हैं, यदि मंदी की बात करेंगे तो अमरीका के लोग क्या करेंगे?

डा0 उत्सव कुमार चतुर्वेदी रोचेस्टर, अमेरिका

Added: 6/21/09 10:17 AM GMT

आर्थिक मंदी की समस्या हक़ीक़त में पूँजीवाद की देन है लेकिन साम्यवाद के पास भी इसका हल नहीं है. साम्यवाद पूँजी के प्रवाह को रोकता है और स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में पूँजी का प्रवाह बाज़ार की तरफ़ रहता है किंतु इसका फ़ायदा एक आदमी को नहीं मिलता तो हम आर्थिक मंदी से निबटने के लिए इस्लामी अर्थव्यवस्था एक विकल्प है जिसमें दोनों के बीच का रास्ता अपनाया जाता है. इसमें पूँजी और संसाधनों का वितरण इस प्रकार होता है कि उनका प्रवाह भी नहीं रुकता और सब के हित में होता है.

zaheer lalitpuri Lalitpur U.P.

Added: 6/21/09 10:01 AM GMT

विश्व के सभी कर्मियों से निवेदन है--
हमें अपना सभी काम अच्छी तरह से करना चाहिए जिसे हम सब करने में पूरी तरह से समर्थ हैं. ऐसी मुश्किल की घड़ी में कम से कम दो साल तक किसी को अपनी तनख़्वाह, पद और काम को नहीं देखना चाहिए. उम्मीद है कि ऐसी संकट की घड़ी जल्दी ही गुज़र जाएगी.

MD. HAMID RAZA do

Added: 6/21/09 9:50 AM GMT

हम अपनी सरकार से यह कहना चाहते हैं कि मंदी से निपटने के लिए सबसे पहले बुराई को पूरे भारत से ख़त्म करना और रोक लगाना चाहिए. तभी हमारा पैसा सब तक पहुँचेगा. वरना बुराइयों और ग़ैरज़रूरी कामों में मेरे ख़याल से लोग 30-40 फ़ीसदी पैसा बर्बाद करते हैं.

MD. HAMID RAZA DOHA - QATAR

Added: 6/21/09 1:43 AM GMT

अब दुनिया के देशों की अर्थव्यवस्था दूसरे देशों पर भी निर्भर करती है. जब हम किसी देश को कुछ बेचते हैं और उस देश में कोई प्रॉब्लम हो जाए तो हमारे निर्यात पर असर पड़ता है. भारत भी आज दुनिया को बहुत कुछ देता है जिसमें मानव संसाधन महत्वपूर्ण है. विकसित देशों की आर्थिक तंगी और घरेलू नीतियों में बदलाव के कारण भारत में मानव संसाधन के निर्यात और सर्विस सेक्टर पर बहुत असर पड़ रहा है. इस मामले में भारत सरकार चाहकर भी कुछ खास नहीं कर सकती है. भारत में रोज़ग़ार बढ़ा कर इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है.

उमेश यादव न्यूयार्क अमरीका

Added: 6/20/09 3:26 PM GMT

ये बहुत नाजुक मोड़ है अर्थव्यवस्था के लिए, ऐसा लग रहा है कि अर्थव्यवस्था में बहुत कुछ बदलाव आएगा अभी ! ये मंदी का सिलसिला आने वाले कुछ समय के लिए चलेगा ! सरकार के प्रयास तो ठीक हैं लेकिन आम पब्लिक को भी इसे ठीक करने में अपना सकारात्मक योगदान देना चाहिए! इस समय में कोई भी जोखिम वाला काम ख़तरनाक हो सकता है!

Murlidhar IIT Kgp

Added: 6/19/09 4:38 PM GMT

मैंने अभी अभी अपना एमबीए पूरा किया और व्यवहारिक दुनिया में हमें पहली बार आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रह है. सही नौकरी पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. जो कंपनियाँ पहले 15 हज़ार से 25 हज़ार वेतन का प्रस्ताव देती थीं वों अब सात से 10 हज़ार वेतन का प्रस्ताव दे रही हैं. मैंने दिल्ली में एक जगह 20 सीटों के छह सौ लोग को इंटरव्यू देते देखा. कई कंपनियाँ एमबीए के बजाए साधरण ग्रेजुएट को ले रही हैं ताकि कम पैसे पर काम कराया जा सके.

deepak kumar mahto ranchi

Added: 6/19/09 11:49 AM GMT

भारत की आर्थिक स्थिति यूरोपीय देशों और अमरीका के मुक़ाबले ज़्यादा ख़राब नहीं है लेकिन चिंता की बात ये है कि कुछ कंपनियाँ इसके बारे में बढ़ा चढ़ा कर दिखा रही हैं. ताज़ा ताज़ा एमबीए करने वाले और दूसरी डिगरियाँ हासिल करने वाले आश्वस्त है कि उन्हें उनकी कुशल्ता और क्षमता के मुताबिक़ नौकरियां मिल जाएंगी. भारत बहुत बड़ा देश है और इसका बज़ार और अधिक बड़ा है. कुछ लोग किसी ख़ास क्षेत्र में काम करने से शरमाते हैं, कुछ लोग सफ़ेद-पोश और दफ़तरी नौकरियाँ ही करना चाहते हैं जो कि व्यवहारिक नहीं है. जहां चाह है वहां राह है.

Mayur Bardolia Leicester, UK

Added: 6/19/09 10:51 AM GMT

महंगाई की मार तो लोगों को झेलनी ही पड़ रही है दूसरी ओर बेरोज़गारों को रोज़गार के नाम ठगी भी हो रही है. ई-मीटर के द्वारा पानी, बिजली, फ़ोन आदि के बिलों को जमा करने के नाम पर भी ठगी हो रही है.

himmat singh bhati jodhpur

Added: 6/19/09 10:45 AM GMT

जैसा कि हम सभी जानते हैं पूरे विश्व की हालत बहुत ही ख़राब चल रही है, साथ में भारत में भी मंदी का असर देखा जा रहा है लेकिन उसके लिए सरकार की तरफ़ से पर्याप्त प्रयास किए जा रहे हैं. इसलिए हमें ज़्यादा चिंता नहीं करना चाहिए. जब पूरा विश्व इस मंदी की वजह से हिल गया है तो भारत जैसा विशाल देश कैसे बच सकता था. ये तो स्वाभाविक था कि भारत भी चपेट में आता और हुआ भी कुछ ऐसा ही. अब इसके लिए हमारी सरकार को ठोस उपाय करने की ज़रूरत है.

AFSAR ABBAS RIZVI "ANJUM" SHIKOHABAD "FIROZABAD"

Added: 6/19/09 3:53 AM GMT

बात मंदी से नहीं महंगाई दर से करता हूँ. अभी महंगाई दर -1.16 फ़ीसदी है, जो पिछले तीस सालों में सबसे कम है. अर्थशास्त्रियों की खुशफ़हमी का बेहतरीन मौक़ा है. हो भी क्यों ना, भला महंगाई दर से इस देश की नरेगा रूपी लॉलीपॉप चूसती आम जनता को क्या मतलब? अब मूल विषय पर लौटन मुनासिब होगा. इस मंदी ने लाखों की नौकरियां तो लील ही ली है, अब तो इस राक्षसी ने ज़िंदगियाँ भी लीलना शुरू कर दिया है. लोगों को आशा है कि जनाब मनमोहन कुछ ऐसा कर देंगे कि मंदी छूमंतर हो जाएगी. एक साल तो बीत गए. करिए इंतज़ार अगले पांच साल का.

Kunal Parashar Hyderabad

Added: 6/18/09 11:23 PM GMT

आपके कवरेज में काफ़ी जानकारी दी गई थी, ख़ास तौर से बड़े शहरों के रियल स्टेट के बारे में. पिछले कुछ वर्षों में ज़मीन की क़ीमतें शहरों में आसमान छूने लगी हैं. और ये क़ीमतें आज भी ज़्यादा है. एक साधारण से घर की क़ीमत करोड़ों में हो, इसका कोई औचित्य नहीं है. बिल्डर्स कमी का माहौल पैदा करके लाभ उठा रहे हैं. क़ीमत को ज़्यादा से ज़्यादा नीचे आना चाहिए ताकि लोगों की पहुंच में हो. इस प्रकार की रिपोर्टें अच्छी हैं. स्थानीय हालात के बारे में और भी जानकारी देते रहें.

Surendra Goindi Whitby

Added: 6/18/09 7:01 PM GMT

मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हो गए हैं. वे देखेंगे. दूसरी ओर सोनिया जी हैं, राहुल भैया हैं, प्रतिभा पाटिल हैं, फिर बीबीसी इतना परेशान क्यों है? ये बात गोविंद ने दिल्ली से लिखी है मेरा जवाब ये है कि आपने घर से देश को कोई कब खाना देते हैं. सरकार जो भी हो सब अपना घर भरती है. दूसरी वजह है क्रिकेट. क्रिकेट की वजह से महंगाई बढ़ रही है, इसे बंद कर देना चहिए.

preem sweden

Added: 6/18/09 6:12 PM GMT

हमें किसी मुग़ालते में नहीं रहना चाहिए कि अर्थव्यवस्था सुधर रही है. नौकरियाँ उसी गति से जा रही हैं और नई नौकरियों के तो लाले पड़े ही हैं. ऐसे में जिनको लगता है कि सब कुछ सही हो रहा है तो वे सचमुच किसी दूसरी दुनिया में जी रहे हैं. हक़ीक़त ये है कि हालत दो साल के पहले नहीं सुधरने वाली. आख़िर वैश्वीकरण का परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा.

वरुण शैलेश new delhi

Added: 6/18/09 5:27 PM GMT

बिहार में एक कहावत है न्योते के भरोसे यज्ञ नही कराया जाता. अपने अंदरुनी बाज़ार और रोज़गार को और विकसित करने की ज़रुरत है. नेताओं पर और अन्य सरकारी अपव्यय को कम कर, उस पैसे के मूलभूत ढांचे के विकास मे लगाया जाए. वैसे इसका ज़्यादा असर भारत के शहरी लोंगो पर पड़ेगा क्योकि वैश्विकरण का मज़ा उन्हें ज़्यादा मिला है, क़र्ज़ ले कर उन्होंने घी पिया है. भात-चोखा खा कर गांव में सोने वालों को बहुत होगा तो थोड़ा चोखा कम खाने को मिलेगा.

chandra kant madrid

बीबीसी को जानिए

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