भारत-पाकिस्तान स्वतंत्रता दिवस
भारत और पाकिस्तान की स्वतंत्रता की बासठवीं वर्षगांठ के मौक़े पर बीबीसी हिंदी और बीबीसी उर्दू एक संयुक्त फ़ोरम प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें हम अपने पाठकों से उनके देश और पड़ोसी देश के बारे में उनके विचार जानना चाहते हैं.
क्या आपको लगता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच एक शांतिपूर्ण रिश्ता संभव है? एक भारतीय होने के नाते आपको पाकिस्तान में क्या पसंद और क्या नापसंद है? क्या यूरोपीय संघ की तर्ज़ पर एक दक्षिण एशियाई संघ अस्तित्व में आ सकता है?
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13 août 2009 10:46 GMT
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Nombre de commentaires:68
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15 août 2009 10:53 GMT
आम भारतीय का दिल शीशे की तरह साफ़ होता है.अगर कोई उसे प्यार से देखता है, वो तपाक से हाथ बढ़ा देता है.अगर कोई हाथ बढ़ाता है, वो उसे गले लगा लेता है.अगर कोई गले लगाता है तो वो उसे दिल में बसा लेता है.इसी आदत की वजह से कभी करगिल तो कभी 26-11 की शक्ल में धोखा खाता है लेकिन जिस तरह संत की प्रकृति होती है, वो तमाम दुष्कारियों के बावजूद परोपकार नहीं छोड़ता, वैसे ही भारत पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश नहीं छोड़ेगा.ज़रूरत है पाकिस्तान भी दिल से एक बार इस भावना को तो दिखाए..
Khushdeep Sehgal, Noida, Inde
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15 août 2009 10:13 GMT
दुनिया में कुछ भी नामुमकिन नहीं. जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो हिंदुस्तान हमेशा चाहता है कि पाकिस्तान से रिश्ता अच्छा रहे मगर पाकिस्तान ने हमेशा उल्टा किया है. भारत उससे बड़ा है ये पाकिस्तान को समझना होगा. सिर्फ़ क्रिकेट और परमाणु विस्फ़ोट में बराबरी करने से वो भारत के बराबर नहीं हो जाता.मुझे पाकिस्तान का खाना पसंद है.
Masih Uzzaman, Gaya, Dubai
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15 août 2009 10:08 GMT
मुझे लगता है कि अगले पचास साल शांति संभव नहीं. असल बात है पाकिस्तानियों की सोच. 1947 में क्या हुआ मैं नहीं चाहता एक भारतीय होने के नाते लेकिन मुझे लगता है कि पाकिस्तान अभी भी 1947 में ही जी रहा है. दोनों देश के नेता अशिक्षित जनता जानते हैं. इस ज़माने में जेहाद की ज़रुरत नहीं है. बुर्के की ज़रुरत नहीं है.
I
shailesh, Dubai
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15 août 2009 08:34 GMT
मुझे पाकिस्तान का संगीत पसंद हैं. वहां के लोग भी पसंद है. वहां के व्यवसायी अच्छे हैं. लेकिन जहां तक शांतिपूर्ण संबंध रखने की बात है तो वहां के राजनेता भ्रष्ट हैं दोनों ही देश के नेता राजनीति के तवे पर अपनी रोटी सेंकते हैं इसलिए शांति संभव नहीं.
rajender singh gill, brampton, On, Canada
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15 août 2009 08:00 GMT
यह बात कहना वैसे ही है जैसे कि शुतुर मुर्ग का जमीन में अपना मुंह छिपाना. यह विचार किसी कवि की कल्पना तो हो सकते हैं लेकिन एक आम आदमी के विचार कभी नहीं. आज पाकिस्तान की स्थिति वैसी है जैसे कोई कमजोर, बीमार, चिड़चड़ा बच्चा अपना गुस्सा अपने बड़े भाई बहनों पर निकालता है उनको मारता है और बड़े भाई उसकी लाचारी पर उसे माफ कर देते हैं, ऐसे बीमार देश को अपने साथ मिलाकर हमें बीमारी थोड़े ही मोल लेनी है. वहां की सारी गंदगी उनको ही मुबारक, हम तो अकेले ही रहना पसंद करेगें, बीमारों को साथ रखने से क्या फायदा.
Bhawani Yadav, Newai
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15 août 2009 06:39 GMT
भविष्य में भारत पाकिस्तान के रिश्ते निर्भर करेंगे पाकिस्तान के व्यवहार पर.
rajesh, lucknow
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15 août 2009 06:21 GMT
भाऱत और पाकिस्तान में सामान्य रिश्ता बनना निश्चित ही संभव है. पाकिस्तान धर्म के नाम पर भारत से अलग हुआ है फिर भी अच्छा मुसलमान और अच्छा अन्य धर्मीय इन में कोई मूलभूत अंतर नही रहता. और बुरे लोग हर समाज में रहते है. यदि हम परस्पर अच्छाई पर ध्यान दे और बुराई दूर करने का प्रयास करे तो यह बात असंभव नही. गांधीजी ने यही सीख हमें दी थी. और जिन्ना साहब ने भी स्वतंत्रता उपरांत अपने पहले भाषण मे सभी धर्म के लोगो को पाकिस्तान में समान अधिकार होगा ऐसा कहा था. बीच में हुई घटनाओको भुलाकर हमे इसी राहपर चलना होगा.
Brijmohan Heda, Amravati
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15 août 2009 06:04 GMT
हिंदुस्तान या पाकिस्तान का सबसे पहले इंसान होना ज़रुरी है. जिस मुल्क ने इंसानियत का सबक सीख लिया उसे उसी दिन आज़ादी मिल गई. पसंद नापसंद का सवाल ही नहीं है क्योंकि पाकिस्तान तो हिंदुस्तान का ही हिस्सा था जिसे कुछ ख़ुदगर्ज़ लोगों ने पाक और हिंद का नाम दे दिया. इंसानियत सबसे ऊपर है.
mohammad subhan, ajmer
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15 août 2009 06:03 GMT
हिंदुस्तान हो या पाकिस्तान पहले एक सच्चा इंसान होना ज़रुरी है. जिस दिन इंसानियत का सबक दोनों मुल्कों ने सीख लिया वही उनकी आज़ादी का दिन होगा. पसंद नापसंद का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि पाकिस्तान तो हिंदुस्तान का ही हिस्सा था वो तो कुछ ख़ुदगर्ज़ लोगों ने इसे हिंद और पाक में बांट दिया. इंसानियत सबसे ऊपर है.
mohammad subhan, ajmer
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15 août 2009 06:02 GMT
स्वतनंत्रता के शहीदों को मेरा शत शत प्रणाम लक्षमी बाई ताँतया टोपे,शहीद भगत सिँह और साथी वीर सावरकर,मंगल पाँडें,लाला लाज पत राय,गोखले जी आचार्य कृपलानी और अन्य नेताओं के बलिदान ही देश को स्वतंत्र करवा गए हैं वरना हम आज भी परतंत्र होते. उस दिन की आस में हूँ जब विभाजन से पहले हम सब (मुस्लिम,हिन्दु,सिख ईसाई ) यह गीत गाते थे दूर हटो ओ दुनियाँ वालों यह देश हमारा है यहाँ हमारे मस्जिद़ मन्दिर सिक्खों का गुरूद्वारा है
दादी
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15 août 2009 05:48 GMT
अवाम के स्तर पर जो लोग पढ़े लिखे हैं वो पहले ही अमन चाहते हैं. ये लोग हमें पसंद हैं. हमें वहां के तालेबान बिल्कुल पसंद नहीं हैं.
Mohd. alauddin, jeddah
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15 août 2009 04:37 GMT
पाकिस्तान की समस्या एक कन्फ्यूज देश की है..6० साल के बाद भी वे निॆणय नहीं कर पा रहें हैं कि भारत के साथ कैसे रिश्ते रखना है...पहले आतंकवादियों के ज़रिए मारकाट का खेल खेला..और धॆम के आधार पर देश को बांटने की कोशिश पाकिस्तान के पढ़े लिखे और तरक्की पसंद लोग जब तक हाशिए पर रहेंगे..वे दोस्ती के लिए जनमत नहीं तैयार कर पाएंगे..भारत में इसके लिए जनमत है कि अमन और तरक्की की जाए अमन और तरक्की की बात करने वाले पाकिस्तानी हमारे दोस्त हैं...वे चाहे किसी भी धमॆ और जाति के क्यों ना हो..
ravish, delhi
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14 août 2009 22:17 GMT
मेरे विचार से ये उस वक़्त तक संभव नहीं है जबतक पाकिस्तान का शासन फ़ौज और अमरिका के हाथों में है. भारत आख़िर बात करे भी तो किस से. इसके लिए वहां नागरिकों की भेद-भाव रहित सरकार होनी चाहिए तभी यह संभव है. जब भी देश हित की बात होती है तो हम भारतीय एकजुट हैं चाहे हम किसी भी धर्म के माने वाले हों और यह चलता रहेगा. लेकिन पाकिस्तान में सांप्रदायिक समस्या है और जब देश हित की बात आती है तो उनमें एकता नज़र नहीं आती है. यह ज़िम्बाबवे और सोमालिया की तरह असफल देश है और इसीलिए अभी यह संभव नहीं है.
JAINUL BARI KHAN, HOLY MAKKAH, Arabie saoudite
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14 août 2009 21:41 GMT
भारत को ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए कि पाकिस्तान भी कोई देश है. ये ऐसी जगह है जहाँ से सिर्फ़ आतंकियों का निर्यात होता है.
ram singh, berlin
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14 août 2009 21:28 GMT
हाँ, ये असंभव तो नहीं पर मुश्किल ज़रूर है. वे उस समय तक नहीं मिल सकते जबतक पाकिस्तान में फ़ौज और चरमपंथ है क्योंकि ये कभी भी मुश्किल हालात खड़े कर सकते हैं. पाकिस्तान के संविधान ने फ़ौज को काफ़ी अधिकार दे रखे हैं जिसका दुर्व्यवहार करने से वे परहेज़ नहीं करेंगे. चरमपंथी हमेशा शांतिपूर्ण रिश्ते में परेशानी पैदा करते रहे हैं. अगर फ़ौज पर पैसा ख़र्च करने के बजाए दूसरे कार्यों पर पैसा ख़र्च किया जाए तो दोनों देश के लिए ये बेहतर होगा.
rohit, toronto
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