इस बहस को सहेज कर रख लिया गया है – जवाब देने की अनुमति नहीं है
किस राह को पकड़े भाजपा?
जसवंत सिंह, सुधींद्र कुलकर्णी के बाद एक और नेता अरुण शौरी ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
अरुण शौरी ने तो भाजपा को कटी पतंग बताते हुए आरोप लगाया है कि पार्टी एक निजी कंपनी की तरह चलाई जा रही है.
दरअसल दो-दो लोकसभा चुनावों में हार के बाद भाजपा असमंजस में फंस गई है और उसे सत्ता का रास्ता नज़र नहीं आ रहा है.
पार्टी का संकट व्यक्तियों के संकट से आगे बढ़ चुका है और भाजपा की मूल विचारधारा पर ही चोट कर रहा है.
भाजपा को सबसे पहले तो 'आडवाणी के बाद कौन?' जैसे मुश्किल सवाल को हल करना है लेकिन पार्टी अब तक इससे कतराती रही है.
ख़ुद भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों में उलझ गए हैं.
आपको क्या लगता है कि भाजपा को इस स्थिति से उबारने में मौजूदा नेतृत्व सक्षम है या फिर इसे सिरे से बदले जाने की ज़रूरत है?
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प्रकाशित:
8/25/09 4:23 AM GMT
टिप्पणियाँ
टिप्पणियों की संख्या:40
सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं
Added:
8/28/09 12:27 PM GMT
भाजपा हिंदु कार्ड का दामन न छोड़ती तो बहुत सफल होती.
अनिल भोपाल
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8/28/09 10:10 AM GMT
वास्तव एक आदमी तो ग़लत हो सकता है लेकिन पूरी पार्टी ही कभी ग़लत नहीं हो सकती है. इसलिए यह एक पंक्ति ही सारी बात कहने के लिए काफ़ी है. सिर्फ़ एक आदमी को निकाल दो और बाक़ी लोग अपना काम करो.
rajkumar noida
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8/28/09 6:45 AM GMT
लगभग हर राजनीतिक पार्टी की एक जैसी ही सत्यकथा है, जब सत्ता रूपी मिष्ठान भंडार के रबड़ी, लड्डू, रसगुल्ले, मेवे आदि सब ख़त्म हो जाते हैं तब आरोपों-प्रत्यारोपों का ऐसा ही दौर चलता है और सबके रास्ते अलग-अलग हो जाते हैं. लेकिन जैसे ही सत्ता का ख़ाली पड़ा मिष्ठान भंडार भर जाता है, तब तमाम आरोपों-प्रत्यारोपों को भुलाने का और एक होकर मिष्ठान वितरण का दौर चलता है.
सिद्धार्थ कौसलायन आर्य ग्रेटर नौएडा-भारत
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8/27/09 10:15 AM GMT
भाजपा को सड़क पर आना चाहिए और हर एक भारतीय को पार्टी का सदस्य बनाना चाहिए.
sanjay kolkata
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Added:
8/27/09 9:13 AM GMT
ये सब भाजपा की बदक़िस्मती नहीं तो और क्या है? कलतक कैडर पर आधारित पार्टी सिर्फ़ सत्ता में नहीं होने के कारण भटक गई है और एक दूसरे की टांग खींचने में लगी हुई है. आख़िरकार यह साबित हो गया कि बीजेपी सिर्फ़ सत्ता के भूके लोगों की पार्टी है.
Vyankat Dubai
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8/27/09 5:02 AM GMT
दरअसल बीजेपी की डोर आरएसएस के हाथों में है. जो आरएसएस कहता है वह बीजेपी करती है. मेरे विचार से बीजेपी को आरएसएस का साथ छोड़ना पड़ेगा तभी बेजेपी का भला हो सकेगा. रही बात पार्टी में फेर बदल की तो अब समय की मांग है कि बीजेपी की डोर युवा हाथों में दी जाए. आडवाणी अब बूढ़े हो गए हैं. भारत युवाओं का देश है. इसके अलावा भाजपा में गुटबाज़ी रोकने के लिए मज़बूत नेता होना चाहिए तो गुटबाज़ी रुक सकेगी जो राजनाथ सिंह के बस में नहीं है. भाजपा को अब विकास की राजनीति करनी चाहिए.
raza husain lucknow
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8/27/09 4:01 AM GMT
सबसे बड़ी समस्या है कि लाल कृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री बनने का मोह छोड़ नहीं पा रहे हैं. अब 81 साल की उम्र भी कोई उम्र होती है.
समीर गोस्वामी, छतरपुर, मध्य प्... छतरपुर, मध्य प्रदेश
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Added:
8/27/09 3:09 AM GMT
संभ्रम की शिकार. नेतृत्व परिवर्तन की पीड़ा से परेशान. समुद्र मंथन में अमृत से पहले ज़हर ही निकला था. ज़हर को शंकर बनकर कौन पीता है, ये देखना है. इस मंथन से बस अमृत निकलने ही वाला है.
vijai kumar delhi
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8/26/09 8:00 PM GMT
मुझे लगता है कि बीजेपी के लिए सिर्फ़ ये लाइनें ही सही है. क्या ख़ूब किया तू ने ज़ख़्मों का इलाज मरहम भी लगाया तो कांटों की नोक से
Arvind Pandey Hyderabad
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8/26/09 7:14 PM GMT
वास्तव में न तो पिछले लोक सभी चुनाव में भाजपा का कोई मुद्दा था और न ही अब. भाजपा को चाहिए की संसद में एक अच्छे विपक्ष का किरदार निभाए. लोगों को हिंदुत्वा या मुल्लावाद नहीं रोटी चाहिए. अगर भाजपा अपने निजी लाभ को छोड़ कर लोगों के हित की बात करे और अल्पसंख्यक को भरोसा दिलाए कि वह अब कट्टर वाद छोड़ कर एक ईमानदार और बिना भेद-भाव की पार्टी का किरदार निभाएगी तो उसका गुज़ारा होगा वरना टुकड़ोम में बट जाएगी ये पार्टी.
Mohammad Tajuddin Al Ain
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8/26/09 1:09 PM GMT
बीजेपी अभी पुनर्गठन की राह पर है और यह तय है कि नई पीढ़ी के हाथ में जाने के बाद पार्टी नज़बूत बनकर उभरेगी. बीजेपी को मिली अनपेक्षित हार के बाद इस तरह की अंतर्कलह होना स्वभाविक था. लेकिन यह सब भूलकर बीजेपी नेताओं को एकजुट होकर पार्टी को मज़बूत बनाने का काम करना चाहिए. और नए नेतृत्व को आगे बढ़ाना चाहिए. अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, नरेंद्र मोदी जैसे कई नेता बीजेपी की राह संवारने में सक्षम हैं.
Ramnath Mutkule Indore
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8/26/09 10:44 AM GMT
बीजेपी अस्तित्व में एक मिशन के सहारे आई थी जिसका नाम था राममंदिर. जनता ने सराहा और इस पार्टी को सत्ता में पहुँचा दिया. फिर भोली-भाली जनता बेवकूफ़ बनती रही. ये तो होना ही था. अब तो लगता है जिस रफ़्तार से राजनीति में प्रवेश किया था, उसी से ख़त्म भी हो जाएगी. अटल बिहारी वाजपेयी आदर्श पुरुष को किनारे कर सत्ता में आने के लिए कमज़ोर प्रधानमंत्री और लौह पुरुष जैसे शब्दों से खेले, कोई काम नहीं दिखा सके, कोई एजेंडा नहीं... और अब अंतर्कलह इतनी कि बर्तन बजने की आवाज़ पूरी दुनिया सुन रही है.
zafar Sahibabad
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8/26/09 7:29 AM GMT
मेरा ख़याल है कि अब बीजेपी के नेतृत्व में व्यापक फेरबदल करने का समय आ गया है. नक़वी, मोदी, सुषमा स्वराज जैसे नए नेताओं को आगे लाए जाने की ज़रूरत है.
Naveen Sheoran Loharu
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8/26/09 6:34 AM GMT
सारी लड़ाई सत्ता की मलाई ना मिलने से शुरू हुई है. जसवंत सिंह हाशिए पर थे और अरुण शौरी हाशिए पर जाने वाले हैं इसलिए इनकी अंतरात्मा अचानाक जाग गई है. फिर आरएसएस तो कमाल है. सत्ता की मलाई काट रहे स्वयंसेवक संगठन मंत्री अब इस पद को नहीं छोड़ना चाहते और आरएसएस है कि विचारधारा की बात करते नहीं अघाता. आरएसएस बीजेपी से क्यों नहीं पूछता कि पार्टी के सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्मृति ईरानी क्या कर रही हैं. क्यों वरुण या मोदी छाप हिंदुत्व देश पर थोपना चाहते हैं.
himanshu mishra delhi
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8/26/09 6:12 AM GMT
बीजेपी अपने अनुभवी नेताओं का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रही है. ऐसा लगता है कि पार्टी के भीतर अनुभवी नेताओं को जितना महत्व मिलना चाहिए था, वो नहीं हो पा रहा है. यह सीधे तौर पर कुप्रबंधन का मामला है और इस सब के लिए सिर्फ़ पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को ही ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है. ऐसा लगता है कि राजनाथ सिंह कुछ चीज़ों को संभाल नहीं पा रहे हैं.
Alok Bangalore
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