इस बहस को सहेज कर रख लिया गया है – जवाब देने की अनुमति नहीं है
क्या हिंदी का दायरा सीमित है?
दिल्ली की अदालतों में हिंदी में बहस की इजाज़त नहीं है. पिछले दिनों कुछ वकीलों ने इसे लेकर एक हस्ताक्षर अभियान चलाया.
विधि आयोग का कहना है कि न्यायिक शब्दों का अंग्रेज़ी में प्रचलन आम हो चुका है और उनका हिंदी में अनुवाद संभव नहीं है.
संविधान की भाषा हो या इंटरनेट पर प्रयोग में आने वाले शब्द-अंग्रेज़ी इन सब पर इतनी हावी है और उसकी पैठ जनमानस में इस तरह हो चुकी है कि वे आम बोलचाल के शब्द लगने लगे हैं.
भारत में आज लगता ही नहीं कि अंग्रेज़ी एक विदेशी भाषा है. इसे चाहे उपनिवेशवादी संस्कृति की देन कहिए या कुछ और लेकिन इसमें दोराय नहीं हैं कि आज भी किसी सरकारी कार्यालय या बैंक में जाकर अंग्रेज़ी में अपनी बात कहने वाले की बात ध्यान से सुनी जाती है.
अब सवाल यह उठता है कि क्या इसे व्यावहारिकता मान कर स्वीकार कर लिया जाए? जब हिंदी की वकालत करने वाले अपने बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूलों में शिक्षा दिलाएँ तो उसे वक़्त की ज़रूरत मान लिया जाए? क्या हिंदी का फलना-फूलना इसी बात पर निर्भर है कि वर्ष में एक दिन उसके नाम कर भारी-भरकम आयोजन कर लिए जाएँ?
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प्रकाशित:
9/14/09 6:32 AM GMT
टिप्पणियाँ
टिप्पणियों की संख्या:69
सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं
Added:
9/26/09 7:39 PM GMT
वो इसलिए क्योंकि हिंदी के नाम पर संस्कृत जैसी आम जनता से कटी हुई भाषा से शब्द निकाल कर हिन्दी को बना दिया गया जो कुछ वर्णवादी मानसिकता वालों के लिए राषट्रीय भाषा और मानक भाषा है. हिन्दुस्तान की भाषा यहां की सभी भाषा के मिलन से बनी भाषा होनी चाहिए. न कि सिर्फ कुछ लोगों की पसंद की भाषा संस्कृत से निकाल कर बनी हुई भाषा.
Shashi Bhushan new delhi
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9/24/09 10:22 AM GMT
अपने देश की हिंदी कौम इतनी आत्मबलहीन हो गइ है कि उसे अंग्रेजी में ही अपना भविष्य दिखाई देता है. देश के नीति निर्माताओं नें तो हिन्दी को राजरानी से नौकरानी बना दिया अब नई पिढी के लिये भी हिंदी किसी काम की चीज नही. अपनी खोखली जडों को लेकर हम जो अपनी प्रगति का दंभ भर रहे है वह गुब्बारा तो एक ना एक दिन तो फूटेगा ही तब हम भी इस्राइलियों की तरह संस्क्रत या हिंदी की जडें खोजते नजर आयेंगें.
पराई चीज पर अपना जनमानुष आखिर कब तक इतराएगा, हिंदी ही मिट जाएगी तो हिंद कहां बच पाएगा
rakesh sambalpur
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9/23/09 3:59 AM GMT
हिंदी बहुत प्यारी है.
dinesh butola canada
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9/22/09 8:16 PM GMT
हिंदी का दायरा असीमित है बस कमी इस बात की है कि जिस गति से इसकी तरक़्क़ी होनी चाहिए उस गति से नहीं हो रही है. हिंदी के विकास में बाधक वे लोग हैं जिनकी रोज़ी-रोटी हिंदी से चल रही है. मेरा इशारा विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाने वालों की ओर है. नौकरी पाने के बाद हर टीचर अपने आप को आम जनता से दूर कर लेता है और ख़ुद को महान कवि, लेखक मान लेता है.
jas ressan maharajganj
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Added:
9/21/09 7:21 PM GMT
हिंदी भाषा पर ज्ञान बघारने वाले लोग पहले ख़ुद जान लें कि दिन भर में वे हिंदी के कितने शब्द इस्तेमाल करते हैं.
vicky bilandi mumbai
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9/21/09 11:31 AM GMT
बस एक दृढ़ निश्चय ही हिंदी को लोकप्रिय भाषा बना सकता है. हिंदी भाषा सक्षम है और इस भाषा को अंग्रेज़ी के कई शब्दों को अपने आप में समेटने की शक्ति है. हिंदी फ़िल्मों को ही देख लीजिए. कितनी व्यापकता देखने में आती है.
jaya Sibu USA
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9/21/09 10:43 AM GMT
हिंदी हमारी मातृभाषा है जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि इसका दायरा सीमित नहीं है. दुनिया की चौथी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है. जबकि अंग्रेज़ी के साथ ऐसा नहीं है.
Ram S Yadav Allahabad
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9/17/09 11:05 AM GMT
विधिआयोग के अधिकारियों द्वारा यह कहा जाना कि अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी में अनुवाद हो पाना संभव नहीं है तो यह सरासर हिन्दी का अपमान है, और सच तो यह है कि उन्हें ठीक से हिन्दी आती ही नहीं इसीलिए वे अंग्रेजी की वकालत करते हैं। यदि हिन्दी के प्रति ऐसी ही शौतेला व्यवहार होगा जैसा विधिआयोग के अधिकारी चाहते हैं तो एक दिन ऐसा आएगा कि हिन्दी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। उन अधिकारियों को अपने आप को हिन्दुस्तानी कहने में जरा भी शर्म नहीं आएगी। जबकि वे हिन्दी के नाम पर बिल्कुल संज्ञा शून्य होंगे।
rajesh dwivedi mumbai
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Added:
9/17/09 8:40 AM GMT
भारत में हिंदी का दायरा सीमित नहीं है बल्कि यह 10 फ़ीसदी भारत वालों का अंग्रेज़ी को बनाए रखने का सोची-समझी साज़िश है जिससे उनका 90 फ़ीसदी हिंदी वालों पर राज चलता रहे. उन्हें बिना कुछ किए-धरे मजे करने का मौक़ा मिल रहा है.बाकी इससे कुछ होने वाला नहीं है.
dharmpalsaini roorkee,uk
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9/17/09 6:59 AM GMT
जब स्वार्थ स्वाभिमान से ऊपर हो तो हम इस तरह राष्ट्रभाषा दिवस मनाते रहेंगे. भीख मांगकर खाने और गुलामी सहने की आदत ने हमें कभी क्रांति के लायक नहीं बनाया. हर राज्य या समुदाय राष्ट्रभाषा से तुलना करता है, उसका अपमान करता है और जब विदेशों में उनके साथ भेदबाव होता है तो राष्ट्रीयता की दुहाई देता है. ऐसे स्वार्थी लोगों और नकारा नेतृत्व ने ही आज़ादी के बाद गुलामी और अंग्रेज़ों को ज़िंदा रखा है.
Karan New Delhi
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9/16/09 8:03 PM GMT
हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं होनी चाहिए. यह अहिंदी भाषी क्षेत्रों की संस्कृति के लिए ख़तरनाक है.
Tamil First! London
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9/16/09 7:43 PM GMT
यह सही है कि सरकारी दफ़्तरों, बैंकों, होटलों आदि में अंग्रेज़ी बोलने से अच्छा रौब जम जाता है और शायद काम बनाने में भी आसानी हो जाती है. अंग्रेज़ी इस औपचारिकता की भाषा हो सकती है, लेकिन आत्मीयता की भाषा तो हिंदी ही है. दोस्तों-रिश्तेदारों के बीच की भाषा, बाज़ार की भाषा तो हिंदी ही है. देश की आबादी बहुत बड़ी है, सब हाइ प्रोफाइल लोग नहीं हैं कि उन्हें सरकारी दफ़्तरों और पांच सितारा होटलों से ही काम पड़े. आप उससे नीचे उतरते ही हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में ही बात करेंगे. हिंदी खत्म नहीं होगी, बढ़ेगी.
यशवंत गहलोत मुंबई
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9/16/09 4:32 PM GMT
हिंदी को देश के क़रीब 70 फ़ीसदी लोग समझते हैं. इसके दायरे को सीमित नहीं कहा जा सकता है. क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाले लोग ऐसी सोच रखते हैं. हिंदी फ़िल्म देखकर तालियाँ बजाएगा, फिर हिंदी का विरोध भी करेगा.
Deepak Tiwari Vadodara भारत
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9/16/09 1:18 PM GMT
किसी और के बारे में कहना ही बेमानी होगा, जब हमारे राजनेता जो देश के खेवनहार हैं वे स्वयं ही हिन्दी का उपयोग करने में अपमानित महसूस करते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर यदि देखा जाए आज उच्च वर्ग हिन्दी बोलना तौहीन मानता है। ऐसे में यह सोचनीय विषय है कि तमाम विसंगतियों के बावजूद राष्ट्र भाषा को उसका उचित स्थान कैसे दिलाया जाए। मेरे विचार से हिन्दी दिवस का आयोजन तभी सार्थक सिद्ध हो सकता है, जब प्रत्येक देशवासी इसे अपनी अंतरात्मा से अपनाने व उचित सम्मान दिलाने का संकल्प लें।
Cindrella Dubai
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9/16/09 8:53 AM GMT
अंग्रेजी भारत में सन १६०० के शुरुआत से पांव पसारे हुए है | यह हमारा अतीत है और इतिहास व् अतीत किसी भी देश की दिशा व् दशा को निर्धारित करते हैं | हिंदी राष्ट्रीय भाषा है तो अंग्रेजी भी सहयोगी अधिकारिक भाषा है |आज भी अंग्रेजी हमारे समाज के विभिन्न वर्गों को एक सूत्र में बांधे रखने का शशक्त औजार है | यह कहना गलत न होगा की विभिन्न भाषाओँ वाले भारत में अंग्रेजी भाषा एक सेतु का कार्य करती है | अंग्रेजी के लिए सकारात्मक रवैया हिंदी व् राष्ट्रहित के लिए कोई बाधा तो कम से कम नहीं हो सकता |
balwant singh hoshiarpur punjab भारत
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