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महिलाओं के साथ बदसलूकी

मुंबई में नए साल का स्वागत करने के लिए इकट्ठा हुए लोगों ने दो महिलाओं के साथ ही बदसलूकी कर डाली. वो महिलाएँ भी अपने मित्रों के साथ नए साल का स्वागत कर रही थीं और ख़बरों के अनुसार एक पाँच सितारा होटल के सामने लोगों के एक झुंड ने दो महिलाओं के कपड़े तक फाड़ डाले.

इस तरह की घटनाएँ पहले भी होती रही हैं जो सवाल उठाती हैं कि अपनी भावनाओं को ज़ाहिर करने का किसे और किस हद तक अधिकार है. अपनी भावनाएँ या विचारधारा किसी और पर लादना किस हद तक जायज़ कहा जा सकता है? क्या इस तरह की घटनाएँ सुरक्षा की कमी दिखाती हैं या फिर लोगों में नैतिक मूल्यों की कमी?

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प्रकाशित: 1/2/08 11:34 AM GMT

टिप्पणियाँ

टिप्पणियों की संख्या:137

सभी टिप्पणियाँ जैसे जैसे वो आती रहती हैं

Added: 1/4/08 1:52 PM GMT

मेरी राय में महिलाओं को उत्तेजक परिधान नहीं पहनने चाहिए.

Md Asadul Haque Baisi

Added: 1/4/08 12:37 PM GMT

सभ्य समाज में कुछ असभ्य लोग रहते हैं और असभ्य समाज में कुछ सभ्य भी होते हैं. बात समय और हालात की है. क्या हम नहीं जानते कि खुशी और जश्न के माहौल में कुछ लोग गलत हरकतें भी करते हैं. ऐसे में खुद को कैसे रखना है यह खुद पर निर्भर करता है.

himmat singh jodhpur

Added: 1/4/08 11:48 AM GMT

निश्चिततौर पर नैतिकता का पतन तो हो ही रहा है, लेकिन ऐसे सवेंदनशील मौके पर सबसे ज्यादा डराने वाली बात है, मुंबई पुलिस कमिश्नर डी एन जाधव का वो बयान जिसमें वो ये कहते हैं कि ऐसी घटनाएं कहीं भी हो सकती हैं। ज़ाहिर है कानून ने हाथ खड़े कर दिये हैं क्योंकि लोगों में कानून का डर और सम्मान खत्म हो गया है और इसकी वजह भी सिस्टम चलाने वाले लोग ही हैं क्योंकि सब जानते है रसूख और पैसों के बूते कुछ भी हो सकता है। पूरे व्यव्यस्था का नये सिरे से ऑपरेशन करने की ज़रूरत है।

SHRIDHAR SHAHDOL (M.P.)

Added: 1/4/08 11:29 AM GMT

जब भी महिलाओं के साथ इस तरह का हादसा होता है तो अधिकतर लोगों का मशविरा होता है कि उन्हें रात में घर से नहीं निकलना चाहिए.जबकि महिलाओं को जहाँ-तहाँ पुरुषों की गंदी मानसिकता का शिकार होना पड़ता है. परिवार में दोनो की शिक्षा अलग होती है. शुरू से ही लड़की को असुरक्षित होने का बोध कराया जाता है जबकि लड़के को खुलकर घूमने फिरने का आज़ादी दी जाती है. इसका खामियाजा लड़कियों को आगे चलकर चुकाना पड़ता है.

safi-ara new delhi-india

Added: 1/4/08 10:45 AM GMT

ये समाज में आ रही गिरावट की निशानी है. लगता है कि आज भारतीय समाज में राजनीति, फ़िल्म और गाने-बजाने के अलावा कुछ भी नहीं है. अंदर से समाज बिल्कुल खोखला हो गया है. इसी गिरावट की वजह से नैतिक मूल्य कहीं देखने को नहीं मिलते. गहराई से सोचने और इसके लिए काम करने की ज़रूरत है.

seraj akram riyadh

Added: 1/4/08 10:41 AM GMT

महिलाओं के प्रति बदसलूकी बेशक विकृत मानसिकता से जुड़ा मामला तो है पर ऐसे लोगों का मानसिक इलाज से पहले पुलिसिया इलाज जरुरी है। ऐसे लोगों को अदालत में मुंह ढंककर नहीं बल्कि खुला चेहरा ले जाना चाहिए ताकि लोग ऐसे निर्लज्ज लोगों को देख सतर्क रह सके।

ऋतु सम्बयाल दिल्ली

Added: 1/4/08 10:41 AM GMT

ज़रूरी है पुरुष की सोच में बदलाव आना. लोगों के बीच यह भावना पैदा करना कि हमारे घर की औरतें भी बाहर निकलती हैं. इस तरह की घटनाएँ होती रहीं तो देश का विकास कैसे होगा. कैसे महिलाएँ पुरुषों के साथ क़दम से क़दम मिला कर चल पाएँगी.

mukesh kumar laskar palakkad kerala

Added: 1/4/08 10:28 AM GMT

यह बहुत ही दुख की बात है कि 21वीं शताब्दी में भी इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं. ये निम्न कोटि की मानिसकता का परिचायक है. ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार जरूरी है.

संजय कुमार पटना, िबहार

Added: 1/4/08 10:12 AM GMT

महिलाओं को ऐसी जगह पर नहीं जाना चहिए जो उनके लिए आमतौर से असुरक्षित हो जैसे डाँसबार और पब जहाँ प्रशासन की ओर से कोई सुरक्षा मुहैया नहीं कराई गई हो. खासकर जब कोई पर्व या विशेष अवसर हो जब प्रशासन के सामने सुरक्षा मुहैया कराना सबसे बड़ी चुनौती होती है. विशेषकर मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और बंगलूर जैसे व्यस्त शहरों मे जहाँ राजनीतिक शक्तियाँ प्रशासन को प्रभावित करती हैं.

Rakesh Bansal Chennai

Added: 1/4/08 9:41 AM GMT

देश में ये कोई पहली घटना नहीं हैं जिसपर इतना हाहाकार मचा हुआ हैं. ऐसी ना जाने कितनी औरतें और लड़कियाँ आज तक इस पुरुष प्रधान समाज के जुल्मों का शिकार हो चुकी हैं. कई तो जिंदा तक जला दी गई हैं. साफ जाहिर है कि ये कमजोरी कानून व्यवस्था की है.

ASIF KHAN HYDERABAD

Added: 1/4/08 9:15 AM GMT

मेरे दिमाग में केवल एक बात है कि भारत में महिला समानता और संरक्षण के लिए कानून कमज़ोर हैं.

Rajesh Kumar Ghori Chandigarh

Added: 1/4/08 9:05 AM GMT

ये पुरुषवादी मानसिकता का विकृत चेहरा है. समाज सभ्य होने का दंभ भरते नही थकता लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है. अब जरूरत है अपने अंदर के इंसान को जगाने की. कल जब ऐसे लोगों को अपने घर की महिलाओं को ऐसी घटनाओं का शिकार होते देखना पङेगा तो क्या तब वो शर्मसार होंगे या गौरवांवित.सरकार को भी अपने स्तर से उचित कदम उठाने चाहिए वरना विकास के वादे और नारे किस काम के.

ranveer singh gorakhpur

Added: 1/4/08 8:57 AM GMT

निश्चत रूप से ये शर्मनाक है. इससे पता चलता है कि लोग अपने नैतिक मूल्य खो रहे हैं और ये एक बड़ा संकट है. सपनों के शहर मुंबई में अगर महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं तो अन्य शहरों में क्या होगा? अब हमे ये सोचना होगा कि हम कहाँ जा रहे हैं.

ALOK RAI lucknow भारत

Added: 1/4/08 8:14 AM GMT

यह लोगों की बिगड़ती हुई मानसिकता के कारण है. कभी लोग माँ-बहनों की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते थे और आज महिला-पुरुष दोनों की मानसिकता में कमी आई है. महिलाओं को कम दोषी नहीं कह सकते. इसलिए ज़रूरत है दोनों को जागरूक होकर अपनी मानसिकता बदलने और धर्माचरण के मूल्यों को पुनर्स्थापित करने की. इसके लिए कोई ध्यान-साधना सहायक होगी.

manoj surat

Added: 1/4/08 8:07 AM GMT

अपनी विचारधारा को दूसरे पर लादना तो सबसे बडा गुनाह है. इस तरह की घटनाएँ सुरक्षा की कमी तो दिखाती ही हैं लेकिन अगर इसके दूसरे पहलु को देखा जाए तो यह दिखता है कि लोगों के नैतिक मूल्यों में कमी आ गई है. अगर नैतिक मूल्यों में कमी आ गई है तो दुनिया का कोई सुरक्षा दस्ता कुछ भी नहीं कर सकता.

sushil pandey sasaram भारत

बीबीसी को जानिए

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